भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि ७

तक, ललाट तक और नासिका के अग्रभाग तक के होने चाहिए ॥ २५ ॥

मुण्डजटिलशिखाजटाश्च ॥ २६ ॥

अत्र न यथासंख्यम् । मुण्डा लुप्तसर्वकेशाः । जटिलाः केशधारिणः । जटा केशसंहतिः । शिखामात्रैव जटा येषां ते शिखाजटाः । सर्वेषामयं सामान्यधर्मः । छन्दोगापेक्षया मुण्डशब्दग्रहणम् ॥ २६ ॥

(ब्रह्मचारी) सभी केश मुंडाये रखे, या जटा धारण करे अथवा केवल शिखा को ही जटा के रूप में रखे ॥ २६ ॥

द्रव्यहस्तश्चेदूच्छिष्टोऽनिधायाऽऽचामेत् ॥ २७ ॥

मूत्रपुरीषयोः कर्म, भोजनादि चोच्छिष्टत्वनिमित्तम् । द्रव्यहस्तः सन्नुच्छिष्टश्चेत्तद्द्रव्यमनिधायाऽऽचामेत् । उच्छिष्टः सन् द्रव्यहस्तश्चेद् द्रव्यं निधायाऽऽचामेत् । तथा च मनुः—

उच्छिष्टेन तु संस्पृष्टो द्रव्यहस्तः कथंचन ।
अनिधायैव तद्द्रव्यमाचान्तः शुचितामियात् ॥ इति ।

किंच भक्ष्यभोज्यादिद्रव्यविषये तद्द्रव्यं निधायैव मूत्रपुरीषयोः कर्म कृत्वा पुनस्तत्पात्रं निधायाऽऽचामेत् । वस्त्रदण्डादिविषये त्वनिधायैवाऽऽचामेत् ॥ २७ ॥

यदि हाथ में (कोई) वस्तु लिये हुए ही मूत्र, पुरीष करे या भोजन करने के उपरान्त जूठा हुआ हो तो उस (हाथ में ली हुई वस्तु) को अलग रखे बिना (अनिधाय) आचमन करे । ॥ २७ ॥

दूसरा अर्थ—यदि (पूर्वोक्त प्रकार से) उच्छिष्ट (अपवित्र या जूठा) होते हुए किसी वस्तु को हाथ में ले तो उसे अलग रखकर (निधाय) आचमन करे ।

तीसरा अर्थ—यदि कोई खाने योग्य वस्तु हाथ में हो तो उसे अलग रखकर मूत्र, पुरीष कर्म करे और तब आचमन करे ।

अथ द्रव्यशुद्धिरुच्यते—

द्रव्यशुद्धिः परिमार्जनप्रदाहतक्षणनिर्णेजनानि तैजसमार्तिकदारववान्तवानाम् ॥ २८ ॥

तैजसादीनां द्रव्याणां यथाक्रमं परिमार्जनादिशुद्धयः । तैजसं कांस्यादि । मार्तिकं मृन्मयादि । दारवं दारुमयादि । तान्तवं तन्तुमयादि । तेषां क्रमेण परिसार्जनम् । तत्र भस्मना कांस्यस्य । शकृता सौवर्णराज-