भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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भूमिका

सूत्र साहित्य

सूत्र साहित्य भारतीय वाङ्मय का एक अनूठा वर्ग है और इसकी विशेषता है इसकी अनोखी शैली। वैदिक साहित्य में सूत्रों का काल अध्ययन और चिन्तन की एक परम्परा का प्रतिनिधि है और भारतीय साहित्य में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह वैदिक साहित्य को परवर्ती संस्कृत साहित्य से जोड़ने वाली श्रृंखला है। जैसा कि माक्स म्यूल्लेर ने कहा है इन सूत्रों की शैली का परिचय उसी व्यक्ति को मिल सकता है जिसने इन्हें समझने का प्रयत्न किया है और इनका शाब्दिक अनुवाद तो संभव हो ही नहीं सकता। सूत्र का अर्थ है धागा और सूत्रों में छोटे, चुस्त, अर्थगर्भित वाक्यों को मानों एक धागे में पिरोकर रखा जाता है। संक्षिप्तता इनकी विशेषता है। पश्चिमी विद्वानों ने इन सूत्रों की शैली पर बहुत आलोचनात्मक ढंग से विचार किया है। प्रो० माक्स म्यूल्लेर ने प्राचीन संस्कृत साहित्य के इतिहास नामक ग्रंथ में सूत्र साहित्य के सन्दर्भ में कहा है :—

“Every doctrine thus propounded, whether Grammar, metre, law, or philosophy, is reduced to a mere skeleton. All the important points and joints of a system are laid open with the greatest precision and clearness, but there is nothing in these works like connection or development of ideas.” ( Page 37 )

कोलेब्रूक ने भी इसी प्रकार का विचार व्यक्त किया है :

“Every apparent simplicity of the design vanishes in the perplexity of the structure. The endless pursuit of exceptions and limitations so disjoins the general precepts, that the reader cannot keep in view their intended connection and mutual relation. He wonders in an intricate maze, and the clue to the labyrinth is continually slipping from his hands.”

सूत्र रचनाओं में अनेक शताब्दियों के ज्ञान का भण्डार एकत्र किया गया है। वे शताब्दियों के चिन्तन, मनन और अध्ययन के परिणाम हैं और उन्हें जो रूप प्राप्त हुआ है वह भी अनेक शताब्दियों की अनवरत परम्परा का परिणाम है। धर्मसूत्रों को श्रुति के अन्तर्गत नहीं माना जाता है, जैसा कि इसके पूर्ववर्ती साहित्य-संहिता और ब्राह्मण को, और इस प्रकार इसे अपौरुषेय न मानकर पौरुषेय माना जाता है। यदि ब्राह्मणों और परवर्ती काल के मन्त्रों के साथ तुलना करें तो हमें सूत्रों में ऐसी कोई बात नहीं मिलती जिसके कारण उन्हें श्रुति में सम्मिलित न किया