भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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१४४ श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—हे छरहरी देहयष्टिवाली (इकहरे बदन वाली) राधे ! तुम्हारे भ्रूचापसे निक्षिप्त कटाक्ष विशिख (बाण) मेरे हृदयको निदारुण पीड़ासे पीड़ित करे, तुम्हारा श्यामल कुटिल केशपाश मेरा वध करनेका उपक्रम करे, तुम्हारा यह बिम्बफलके समान राग-रञ्जित अधर मुझमें मोह उदित करे, किन्तु तुम्हारा यह सद्वृत्त (सुगोल) मनोहर मण्डलाकार स्तनयुगल सुचरित होकर क्रीड़ाके छलसे मेरे प्राणोंके साथ क्यों क्रीड़ा कर रहा है ? पद्यानुवाद— हे तन्वि, नेत्र-शर तेरे, नित छेद रहे हैं उरको वे व्याल केश भी रह-रह, डँसते रहते हैं मुझको। वे सरस मधुर बिम्बाधर, मुझको मोहाकुल करते उन्नत उरोज सखि! तेरे, क्यों जी में जीवन भरते ॥ बालबोधिनी—श्रीराधाका ध्यान करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं, राधे ! तुम्हारे भ्रूकुटि धनुषमें आरोपित बाण ही मेरे अन्तःकरणको प्रपीड़ित कर रहे हैं, तुम्हारे कटाक्षकी लहरें ही बाण हैं, उनका ऐसा करना उचित ही है, क्योंकि धनुषसे सम्बन्धित बाण स्वाभाविकरूपसे दूसरोंके लिए दुःखदायी होते हैं—दूसरोंको विदीर्ण करना ही तो इनका धर्म है। तुम्हारे काले कुञ्चित स्वाभाविक रूपसे वक्रता धारण किये हुए केश भी मारनेका पराक्रम करते हैं, यह भी अनुचित नहीं है, क्योंकि जिसका हृदय कुटिल एवं मलिन होता है, वह दूसरोंको मारनेका प्रयास स्वाभाविकरूपसे करते ही हैं। हे कृशाङ्गि राधे ! बिम्बफल सदृश तुम्हारा यह रक्तिम अधर मुझे मूर्च्छित कर रहा है, उसमें भी कोई अनौचित्य नहीं हैं, क्योंकि जो रागी होता है वह अनुरागमें क्या नहीं करता ? दूसरोंको मोहित करनेका काम स्वाभाविकरूपसे करता है। किन्तु यह अवश्य ही अनुचित लगता है कि तुम्हारा