गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० * गीता-संग्रह *
नाम योग नहीं, विषय-सुखकी प्राप्ति होनेका नाम योग नहीं और इन्द्रियसम्पन्न होनेका नाम भी योग नहीं है ॥ ७॥ योगो यः पितृमात्रादेर्न स योगो नराधिप। यो योगो बन्धुपुत्रादेर्यश्चाष्टभूतिभिः सह॥ ८॥ हे राजन्! माता-पिताके समागमका नाम योग नहीं है। आठ प्रकारकी सिद्धि और बन्धुपुत्रादिकी प्राप्तिका नाम भी योग नहीं है॥ ८॥ न स योगः स्त्रिया योगो जगदद्भुतरूपया। राज्ययोगश्च नो योगो न योगो गजवाजिभिः॥ ९॥ अत्यन्त रूपवती स्त्रीकी प्राप्तिका नाम योग नहीं है, राज्यकी प्राप्ति तथा हाथी-घोड़ेकी प्राप्तिका नाम भी योग नहीं है॥ ९॥ योगो नेन्द्रपदस्यापि योगो योगार्थिनः प्रियः। योगो यः सत्यलोकस्य न स योगो मतो मम॥ १०॥ इन्द्रपदकी प्राप्तिका नाम योग नहीं है, योगद्वारा प्रिय सिद्धिकी इच्छा अथवा सत्यलोककी प्राप्तिको भी मैं योग नहीं मानता॥ १०॥ शैवस्य योगो नो योगो वैष्णवस्य पदस्य यः। न योगो भूप सूर्यत्वं चन्द्रत्वं न कुबेरता॥ ११॥ हे राजन्! शिवपदकी प्राप्ति होना, वैष्णवपदकी प्राप्ति होना, सूर्य-चन्द्र और कुबेरके पदकी प्राप्ति होनेका भी नाम योग नहीं है॥ ११॥ नानिलत्वं नानलत्वं नामरत्वं न कालता। न वारुण्यं न नैर्ऋत्यं योगो न सार्वभौमता॥ १२॥ वायुस्वरूप, अग्निस্বরূপ, देवस्वरूप, कालस्वरूप, वरुणस्वरूप, निर्ऋतिस्वरूप अथवा सम्पूर्ण पृथ्वीके आधिपत्य पानेका नाम भी योग नहीं है॥ १२॥