गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११२ * गीता-संग्रह *
स्थाल्यग्नितापात्पयसोऽभिताप- ⠀⠀स्तत्तापतस्तण्डुलगर्भरन्धिः । देहेन्द्रियास्वाशयसन्निकर्षात् ⠀⠀तत्संसृतिः पुरुषस्यानुरोधात् ॥ २२ ॥
(देहादिके धर्मोंका आत्मापर कोई प्रभाव ही नहीं होता, ऐसी बात भी नहीं है) चूल्हेपर रखी हुई बटलोई जब अग्निसे तपने लगती है, तब उसका जल भी खौलने लगता है और फिर उस जलसे चावलका भीतरी भाग भी पक जाता है। इसी प्रकार अपनी उपाधिके धर्मोंका अनुवर्तन करनेके कारण देह, इन्द्रिय, प्राण और मनकी सन्निधिसे आत्माको भी उनके धर्म श्रमादिका अनुभव होता ही है॥ २२ ॥
शास्ताभिगोप्ता नृपतिः प्रजानां ⠀⠀यः किङ्करो वै न पिनष्टि पिष्टम्। स्वधर्ममाराधनमच्युतस्य ⠀⠀यदीहमानो विजहात्यघौघम् ॥ २३ ॥
आपने जो दण्डादिकी व्यर्थता बतायी, सो राजा तो प्रजाका शासन और पालन करनेके लिये नियुक्त किया हुआ उसका दास ही है। उसका उन्मत्तादिको दण्ड देना पिसे हुएको पीसनेके समान व्यर्थ नहीं हो सकता; क्योंकि अपने धर्मका आचरण करना भगवान्की सेवा ही है, उसे करनेवाला व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण पापराशिको नष्ट कर देता है॥ २३ ॥
तन्मे भवान्नरदेवाभिमान- ⠀⠀मदेन तुच्छीकृतसत्तमस्य। कृषीष्ट मैत्रीदृशमार्तबन्धो ⠀⠀यथा तरे सदवध्यानमंहः ॥ २४ ॥
दीनबन्धो! राजत्वके अभिमानसे उन्मत्त होकर मैंने आप-जैसे