गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
पृष्ठ 123, कुल 675 में से
संदर्भ में पढ़ें१२२ * गीता-संग्रह *
कहारोंको बेगारमें पकड़कर पालकीमें जोत रखा है और फिर महापुरुषोंकी सभाओंमें बढ़-बढ़कर बातें बनाते हो कि मैं लोकोंकी रक्षा करनेवाला हूँ। यह तुम्हें शोभा नहीं देता॥७॥
यदा क्षितावेव चराचरस्य विदाम निष्ठां प्रभवं च नित्यम्। तन्नामतोऽन्यद् व्यवहारमूलं निरूप्यतां सत् क्रियानुमेयम्॥८॥
हम देखते हैं कि सम्पूर्ण चराचर भूत सर्वदा पृथ्वीसे ही उत्पन्न होते हैं और पृथ्वीमें ही लीन होते हैं; अतः उनके क्रियाभेदके कारण जो अलग-अलग नाम पड़ गये हैं—बताओ तो, उनके सिवा व्यवहारका और क्या मूल है?॥८॥
एवं निरुक्तं क्षितिशब्दवृत्त- मसन्निधानात्परमाणवो ये। अविद्यया मनसा कल्पितास्ते येषां समूहेन कृतो विशेषः॥९॥
इस प्रकार 'पृथ्वी' शब्दका व्यवहार भी मिथ्या ही है; वास्तविक नहीं है; क्योंकि यह अपने उपादानकारण सूक्ष्म परमाणुओंमें लीन हो जाती है। और जिनके मिलनेसे पृथ्वीरूप कार्यकी सिद्धि होती है, वे परमाणु अविद्यावश मनसे ही कल्पना किये हुए हैं। वास्तवमें उनकी भी सत्ता नहीं है॥९॥
एवं कृशं स्थूलमणुर्बृहद्यद् असच्च सज्जविमजीवमन्यत्। द्रव्यस्वभावाशयकालकर्म- नाम्नाजयावेहि कृतं द्वितीयम्॥१०॥
इसी प्रकार और भी जो कुछ पतला-मोटा, छोटा-बड़ा, कार्य-