गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ * गीता-संग्रह *
चलनी हो जानेसे उदास हो जाता है। कुटुम्ब बहुत बढ़ जाता है और उदरपूर्तिका साधन नहीं होता तो भूखकी ज्वालासे सन्तप्त होकर अपने ही बन्धु-बान्धवोंपर खीझने लगता है॥ ८॥
क्वचिन्निगीर्णोऽजगराहिना जनो नावैति किञ्चिद्विपिनेऽपविद्धः। दष्टः स्म शेते क्व च दन्दशूकै- रन्धोऽन्धकूपे पतितस्तमिस्रे॥ ९॥
कभी अजगर सर्पका ग्रास बनकर वनमें फेंके हुए मुर्देके समान पड़ा रहता है। उस समय इसे कोई सुध-बुध नहीं रहती। कभी दूसरे विषैले जन्तु इसे काटने लगते हैं तो उनके विषके प्रभावसे अन्धा होकर किसी अन्धे कुएँमें गिर पड़ता है और घोर दुःखमय अन्धकारमें बेहोश पड़ा रहता है॥ ९॥
कर्हि स्म चित्क्षुद्ररसान् विचिन्वं- स्तन्मक्षिकाभिर्व्यथितो विमानः। तत्रातिकृच्छ्रात्प्रतिलब्धमानो बलाद्विलुम्पन्त्यथ तं ततोऽन्ये॥ १०॥
कभी मधु खोजने लगता है तो मक्खियाँ इसके नाकमें दम कर देती हैं और इसका सारा अभिमान नष्ट हो जाता है। यदि किसी प्रकार अनेकों कठिनाइयोंका सामना करके वह मिल भी गया तो बलात् दूसरे लोग उसे छीन लेते हैं॥ १०॥
क्वचिच्च शीतातपवातवर्ष- प्रतिक्रियां कर्तुमनीश आस्ते। क्वचिन्मिथो विपणन् यच्च किञ्चिद् विद्वेषमृच्छत्युत वित्तशाठ्यात्॥ ११॥
कभी शीत, घाम, आँधी और वर्षासे अपनी रक्षा करनेमें असमर्थ