गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- षड्जगीता * १५३
आस्तिका नास्तिकाश्चैव नियताः संयमे परे। अप्रज्ञानं तमोभूतं प्रज्ञानं तु प्रकाशिता ॥ १९॥
दूसरे बहुत-से आस्तिक-नास्तिक संयम-नियमपरायण पुरुष हैं, जो अर्थके इच्छुक होते हैं। अर्थकी प्रधानताको न जानना तमोमय अज्ञान है। अर्थकी प्रधानताका ज्ञान प्रकाशमय है॥ १९॥
भृत्यान् भोगैर्द्विषो दण्डैर्यो योजयति सोऽर्थवान्। एतन्मतिमतां श्रेष्ठ मतं मम यथातथम्। अनयोस्तु निबोध त्वं वचनं वाक्यकण्ठयोः ॥ २०॥
धनवान् वही है, जो अपने भृत्योंको उत्तम भोग और शत्रुओंको दण्ड देकर उनको वशमें रखता है। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ महाराज ! मुझे तो यही मत ठीक जँचता है। अब आप इन दोनोंकी बात सुनिये। इनकी वाणी कण्ठतक आ गयी है अर्थात् ये दोनों भाई बोलनेके लिये उतावले हो रहे हैं ॥ २० ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो धर्मार्थकुशलौ माद्रीपुत्रावनन्तरम्। नकुलः सहदेवश्च वाक्यं जगदतुः परम् ॥ २१ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—[राजन् !] तदनन्तर धर्म और अर्थके ज्ञानमें कुशल माद्रीकुमार नकुल और सहदेवने अपनी उत्तम बात इस प्रकार उपस्थित की ॥ २१ ॥
नकुलसहदेवावूचतुः
आसीनश्च शयानश्च विचरन्नपि वा स्थितः। अर्थयोगं दृढं कुर्याद् योगैरुच्चावचैरपि ॥ २२ ॥
नकुल-सहदेव बोले—[महाराज !] मनुष्यको बैठते, सोते, घूमते-फिरते अथवा खड़े होते समय भी छोटे-बड़े हर तरहके उपायोंसे धनकी आयको सुदृढ़ बनाना चाहिये ॥ २२ ॥