गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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दान और प्रतिग्रहमें लोगोंकी प्रवृत्ति होती है॥ ३१॥ वणिजः कर्षका गोपाः कारवः शिल्पिनस्तथा। देवकर्मकृतश्चैव युक्ताः कामेन कर्मसु॥ ३२॥ व्यापारी, किसान, ग्वाले, कारीगर और शिल्पी तथा देव-सम्बन्धी कार्य करनेवाले लोग भी कामनासे ही अपने-अपने कर्मोंमें लगे रहते हैं॥ ३२॥ समुद्रं वा विशन्त्यन्ये नराः कामेन संयुताः। कामो हि विविधाकारः सर्वं कामेन सन्ततम्॥ ३३॥ कामनासे युक्त हुए दूसरे मनुष्य समुद्रमें भी घुस जाते हैं। कामनाके विविध रूप हैं तथा सारा कार्य ही कामनासे व्याप्त है॥ ३३॥ नास्ति नासीन्नाभविष्यद् भूतं कामात्मकात् परम्। एतत् सारं महाराज धर्मार्थावत्र संस्थितौ॥ ३४॥ महाराज! सभी प्राणी कामना रखते हैं। उससे भिन्न कामनारहित प्राणी न कहीं है, न कभी था और न भविष्यमें होगा ही; अतः यह काम ही त्रिवर्गका सार है। धर्म और अर्थ भी इसीमें स्थित हैं॥ ३४॥ नवनीतं यथा दध्नस्तथा कामोऽर्थधर्मतः। श्रेयस्तैलं हि पिण्याकाद् घृतं श्रेय उदश्वितः। श्रेयः पुष्पफलं काष्ठात् कामो धर्मार्थयोर्वरः॥ ३५॥ जैसे दहीका सार माखन है, उसी प्रकार धर्म और अर्थका सार काम है। जैसे खलीसे श्रेष्ठ तेल है, तक्रसे श्रेष्ठ घी है और वृक्षके काष्ठसे श्रेष्ठ उसका फूल और फल है, उसी प्रकार धर्म और अर्थ दोनोंसे श्रेष्ठ काम है॥ ३५॥ पुष्पतो मध्विव रसः काम आभ्यां तथा स्मृतः। कामो धर्मार्थयोर्योनिः कामश्चाथ तदात्मकः॥ ३६॥ जैसे फूलसे उसका मधु-तुल्य रस श्रेष्ठ है, उसी प्रकार धर्म