गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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- षड्जगीता * १५९ युधिष्ठिर उवाच निःसंशयं निश्चितधर्मशास्त्राः सर्वे भवन्तो विदितप्रमाणाः। विज्ञातुकामस्य ममेह वाक्य- मुक्तं यद्वै नैष्ठिकं तच्छ्रुतं मे। इदं त्ववश्यं गदतो ममापि वाक्यं निबोधध्वमनन्यभावाः ॥ ४३ ॥ युधिष्ठिर बोले—[बन्धुओ!] इसमें संदेह नहीं कि आपलोग धर्मशास्त्रोंके सिद्धान्तोंपर विचार करके एक निश्चयपर पहुँच चुके हैं। आपलोगोंको प्रमाणोंका भी ज्ञान प्राप्त है। मैं सबके विचार जानना चाहता था, इसलिये मेरे सामने यहाँ आपलोगोंने जो अपना-अपना निश्चित सिद्धान्त बताया है, वह सब मैंने ध्यानसे सुना है। अब आप, मैं जो कुछ कह रहा हूँ, मेरी उस बातको भी अनन्यचित्त होकर अवश्य सुनिये ॥ ४३ ॥ यो वै न पापे निरतो न पुण्ये नार्थे न धर्मे मनुजो न कामे। विमुक्तदोषः समलोष्टकाञ्चनो विमुच्यते दुःखसुखार्थसिद्धेः ॥ ४४ ॥ जो न पापमें लगा हो और न पुण्यमें, न तो अर्थोपार्जनमें तत्पर हो न धर्ममें, न काममें ही। वह सब प्रकारके दोषोंसे रहित मनुष्य दुःख और सुखको देनेवाली सिद्धियोंसे सदाके लिये मुक्त हो जाता है, उस समय मिट्टीके ढेले और सोनेमें उसका समान भाव हो जाता है ॥ ४४ ॥ भूतानि जातिस्मरणात्मकानि जराविकारैश्च समन्वितानि। भूयश्च तैस्तैः प्रतिबोधितानि मोक्षं प्रशंसन्ति न तं च विद्मः ॥ ४५ ॥ जो पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण करनेवाले तथा वृद्धावस्थाके