गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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उन्हें जैसा उपदेश दिया था, उसी प्राचीन इतिहासको विज्ञ पुरुष दृष्टान्तके रूपमें प्रस्तुत किया करते हैं॥ ८॥ पुत्रशोकाभिसन्तप्तं राजानं शोकविह्वलम्। विषण्णमनसं दृष्ट्वा विप्रो वचनमब्रवीत्॥ ९॥
राजा सेनजित्के पुत्रकी मृत्यु हो गयी थी। वे उसीके शोककी आगसे जल रहे थे। उनका मन विषादमें डूबा हुआ था। उन शोकविह्वल नरेशको देखकर ब्राह्मणने इस प्रकार कहा— ॥ ९॥
किं नु मुह्यसि मूढस्त्वं शोच्यः किमनुशोचसि। यदा त्वामपि शोचन्तः शोच्या यास्यन्ति तां गतिम्॥ १०॥
[राजन्!] तुम मूढ़ मनुष्यकी भाँति क्यों मोहित हो रहे हो? शोकके योग्य तो तुम स्वयं ही हो, फिर दूसरोंके लिये क्यों शोक करते हो? अजी! एक दिन ऐसा आयेगा, जब कि दूसरे शोचनीय मनुष्य तुम्हारे लिये भी शोक करते हुए उसी गतिको प्राप्त होंगे॥ १०॥
त्वं चैवाहं च ये चान्ये त्वामुपासन्ति पार्थिव। सर्वे तत्र गमिष्यामो यत एवागता वयम्॥ ११॥
‘पृथ्वीनाथ! तुम, मैं और ये दूसरे लोग जो इस समय तुम्हारे पास बैठे हैं, सब वहीं जायँगे, जहाँसे हम आये हैं’॥ ११॥
सेनजिदुवाच
का बुद्धिः किं तपो विप्र कः समाधिस्तपोधन। किं ज्ञानं किं श्रुतं चैव यत् प्राप्य न विषीदसि॥ १२॥
सेनजित्ने पूछा—तपस्याके धनी ब्राह्मणदेव! आपके पास ऐसी कौन-सी बुद्धि, कौन-सा तप, कौन-सी समाधि, कैसा ज्ञान और कौन-सा शास्त्र है, जिसे पाकर आपको किसी प्रकारका विषाद नहीं है॥ १२॥
( हृष्यन्तमवसीदन्तं सुखदुःखविपर्यये। आत्मानमनुशोचामि ममैष हृदि संस्थितः॥)
सुख और दुःखका चक्र घूमता रहता है। मैं सुखमें हर्षसे फूल