भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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* पिंगलागीता * १६७


प्राप्ति होगी। यहाँ किसी भी प्राणीको न तो सदा सुख ही प्राप्त होता है और न सदा दुःख ही॥ २० ॥

शरीरमेवायतनं सुखस्य दुःखस्य चाप्यायतनं शरीरम्। यद्यच्छरीरेण करोति कर्म तेनैव देही समुपाश्नुते तत्॥ २१॥

यह शरीर ही सुखका आधार है और यही दुःखका भी आधार है। देहाभिमानी पुरुष शरीरसे जो-जो कर्म करता है, उसीके अनुसार वह सुख एवं दुःखरूप फल भोगता है॥ २१॥

जीवितं च शरीरेण जात्यैव सह जायते। उभे सह विवर्तेते उभे सह विनश्यतः॥ २२॥

यह जीवन स्वभावतः शरीरके साथ ही उत्पन्न होता है। दोनों साथ-साथ विविध रूपोंमें रहते हैं और साथ-ही-साथ नष्ट हो जाते हैं॥ २२॥

स्नेहपाशैर्बहुविधैराविष्टविषया जनाः। अकृतार्थाश्च सीदन्ते जलैः सैकतसेतवः॥ २३॥

मनुष्य नाना प्रकारके स्नेह-बन्धनोंमें बँधे हुए हैं, अतः वे सदा विषयोंकी आसक्तिसे घिरे रहते हैं; इसीलिये जैसे बालूद्वारा बनाये हुए पुल जलके वेगसे बह जाते हैं, उसी प्रकार उन मनुष्योंकी विषयकामना सफल नहीं होती; जिससे वे दुःख पाते रहते हैं॥ २३॥

स्नेहेन तिलवत् सर्वं सर्गचक्रे निपीड्यते। तिलपीडैरिवाक्रम्य क्लेशैरज्ञानसम्भवैः॥ २४॥

तेलीलोग तेलके लिये जैसे तिलोंको कोल्हूमें पेरते हैं, उसी प्रकार स्नेहके कारण सब लोग अज्ञानजनित क्लेशोंद्वारा सृष्टिचक्रमें पिस रहे हैं॥ २४॥