भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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मङ्किगीता

[मङ्किगीता महाभारतके शान्तिपर्वके अन्तर्गत भीष्म-युधिष्ठिर-संवादके क्रममें प्राप्त होती है। इसमें मङ्कि नामक एक प्राचीन मुनिका रोचक एवं शिक्षाप्रद आख्यान वर्णित है, जिसके माध्यमसे कामना, विशेषकर धनकी तृष्णाको ही सभी दुःखोंका मूल तथा कामनाके त्यागको ही सुखका हेतु बताया गया है। विषयके प्रतिपादनमें दृष्टान्तके अतिरिक्त बहुत-से सबल तर्क भी उपस्थित किये गये हैं। यह मङ्किगीता यहाँ सानुवाद प्रस्तुत की जा रही है—]

युधिष्ठिर उवाच

ईहमानः समारम्भान् यदि नासादयेद् धनम्।
धनतृष्णाभिभूतश्च किं कुर्वन् सुखमाप्नुयात्॥ १॥
युधिष्ठिरने पूछा—[दादाजी !] यदि कोई मनुष्य धनकी तृष्णासे ग्रस्त होकर तरह-तरहके उद्योग करनेपर भी धन न पा सके तो वह क्या करे, जिससे उसे सुखकी प्राप्ति हो सके?॥ १॥

भीष्म उवाच

सर्वसाम्यमनायासं सत्यवाक्यं च भारत।
निर्वेदश्चाविविधित्सा च यस्य स्यात् स सुखी नरः॥ २॥
**भीष्मजीने कहा—**भारत! सबमें समताका भाव, व्यर्थ परिश्रमका अभाव, सत्यभाषण, संसारसे वैराग्य और कर्मासक्तिका अभाव—ये पाँचों जिस मनुष्यमें होते हैं, वह सुखी होता है॥ २॥

एतान्येव पदान्याहुः पञ्च वृद्धाः प्रशान्तये।
एष स्वर्गश्च धर्मश्च सुखं चानुत्तमं मतम्॥ ३॥
ज्ञानवृद्ध पुरुष इन्हीं पाँच वस्तुओंको शान्तिका कारण बताते हैं। यही