गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवृत्रगीता
[महाबली वृत्रासुरको जब देवताओंद्धारा पराजित होकर भी कोई शोक-सन्ताप नहीं हुआ तो दैत्यगुरु शुक्राचार्यजीको बड़ा आश्चर्य हुआ। उनके पूछनेपर वृत्रासुरने बहुत ज्ञानयुक्त वचन कहे, परंतु साथ ही वृत्रासुरने भगवान् विष्णुके प्रभाव, मनुष्योंद्धारा जीवनधारणके हेतु, कर्मोंमें प्रवृत्तिका कारण, कर्मफल तथा सनातनपदकी प्राप्तिका उपाय आदिके विषयमें जिज्ञासा व्यक्त की, जिसका समाधान वहाँ उपस्थित हुए भगवान् सनत्कुमारजीने उत्तम रीतिसे किया, जो सभी कल्याणकामी साधकोंके लिये लाभप्रद है। यह वृत्रासुर-शुक्राचार्यका संवाद तथा सनत्कुमारजीद्धारा उनको दिये गये उपदेश मिलकर ‘वृत्रगीता’ नामसे ख्यात हुए, जो महाभारतके शान्तिपर्वके अन्तर्गत भीष्म-युधिष्ठिर-संवादका ही अंग है। यह वृत्रगीता यहाँ सानुवाद प्रस्तुत की जा रही है—]
पहला अध्याय
ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय तथा उस विषयमें वृत्र-शुक्र-संवादका आरम्भ
युधिष्ठिर उवाच
धन्या धन्या इति जनाः सर्वेऽस्मान् प्रवदन्त्युत।
न दुःखिततरः कश्चित् पुमानस्माभिरस्ति ह॥ १॥
युधिष्ठिरने कहा—पितामह! सभी लोग हमलोगोंको धन्य-धन्य कहते हैं, परंतु हमलोगोंसे बढ़कर अत्यन्त दुःखी दूसरा कोई मनुष्य नहीं है॥ १॥
लोकसम्भावितैर्दुःखं यत् प्राप्तं कुरुसत्तम।
प्राप्य जातिं मनुष्येषु देवैरपि पितामह॥ २॥
कुरुश्रेष्ठ पितामह! देवताओंद्धारा मानवलोकमें जन्म पाकर तथा सब