गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ * गीता-संग्रह *
वृत्र उवाच सत्येन तपसा चैव विदित्वासंशयं ह्यहम्। न शोचामि न हृष्यामि भूतानामागतिं गतिम्॥ १६॥ वृत्रासुरने कहा—ब्रह्मन्! मैंने सत्य और तपके प्रभावसे जीवोंके आवागमनका रहस्य निश्चितरूपसे जान लिया है; इसलिये मैं उसके विषयमें हर्ष और शोक नहीं करता हूँ॥ १६॥
कालसञ्चोदिता जीवा मज्जन्ति नरकेऽवशाः। परितुष्टानि सर्वाणि दिव्यान्याहुर्मनीषिणः॥ १७॥ कालसे प्रेरित हुए जीव अपने पापकर्मोंके फलस्वरूप विवश होकर नरकमें डूबते हैं और पुण्यके फलसे वे सब-के-सब स्वर्गलोकमें जाकर वहाँ आनन्द भोगते हैं। ऐसा मनीषी पुरुषोंका कथन है॥ १७॥
क्षपयित्वा तु तं कालं गणितं कालचोदिताः। सावशेषेण कालेन सम्भवन्ति पुनः पुनः॥ १८॥ इस प्रकार स्वर्ग अथवा नरकमें कर्मफलभोगद्वारा निश्चित समय व्यतीत करके भोगनेसे बचे हुए कर्मसहित कालकी प्रेरणासे वे बारम्बार इस संसारमें जन्म लेते रहते हैं॥ १८॥
तिर्यग्योनिसहस्राणि गत्वा नरकमेव च। निर्गच्छन्त्यवशा जीवाः कामबन्धनबन्धनाः॥ १९॥ कामनाओंके बन्धनमें बँधकर विवश हुए कितने ही जीव सहस्रों बार तिर्यग्योनि तथा नरकमें पड़कर पुनः वहाँसे निकलते हैं॥ १९॥
एवं संसरमाणानि जीवान्यहमदृष्टवान्। यथा कर्म तथा लाभ इति शास्त्रनिदर्शनम्॥ २०॥ इस प्रकार मैंने सभी जीवोंको जन्म-मरणके चक्करमें पड़ा हुआ देखा है। शास्त्रका भी ऐसा सिद्धान्त है कि जैसा कर्म होता है, वैसा ही फल मिलता है॥ २०॥