गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१८ * गीता-संग्रह *
लोकोंपर आक्रमण करके दूसरे प्राणियोंको धूलमें मिलाकर उनके उपभोगकी गन्ध और रस आदि विविध वस्तुएँ छीन ली थीं॥ २५ ॥ ज्वालामालापरिक्षिप्तो वैहायसचरस्तथा। अजेयः सर्वभूतानामासं नित्यमपेतभीः॥ २६॥ मेरे शरीरसे आगकी लपटें निकलती थीं और मैं ज्वालामालाओंसे घिरकर सदा आकाशमें निर्भय विचरता हुआ समस्त प्राणियोंके लिये अजेय हो गया था॥ २६॥ ऐश्वर्यं तपसा प्राप्तं भ्रष्टं तच्च स्वकर्मभिः। धृतिमास्थाय भगवन् न शोचामि ततस्त्वहम्॥ २७॥ भगवन्! इस प्रकार मैंने तपस्याके प्रभावसे जो ऐश्वर्य प्राप्त किया था, वह मेरे अपने ही कर्मोंसे नष्ट हो गया। तथापि मैं धैर्य धारण करके उसके लिये शोक नहीं करता हूँ॥ २७॥ युयुत्सुना महेन्द्रेण पुंसा सार्धं महात्मना। ततो मे भगवान् दृष्टो हरिर्नारायणः प्रभुः॥ २८॥ महामनस्वी पुरुषप्रवर देवराज इन्द्र जब युद्धकी इच्छासे मेरे सामने आये, उस समय उनके साथ उन्हींकी सहायताके लिये आये हुए सबके प्रभु भगवान् श्रीनारायण हरिका मैंने दर्शन किया था॥ २८॥ वैकुण्ठः पुरुषोऽनन्तः शुक्लो विष्णुः सनातनः। मुञ्जकेशो हरिश्मश्रुः सर्वभूतपितामहः॥ २९॥ वे भगवान् वैकुण्ठ, पुरुष, अनन्त, शुक्ल, विष्णु, सनातन, मुंजकेश, हरिश्मश्रु तथा सम्पूर्ण भूतोंके पितामह हैं॥ २९॥ नूनं तु तस्य तपसः सावशेषमिहास्ति वै। यदहं प्रष्टुमिच्छामि भगवन् कर्मणः फलम्॥ ३०॥ भगवन्! अवश्य ही मेरी उस तपस्याका कोई अंश अब भी शेष