गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- वृत्रगीता * २२५
(तं विद्धि भूतं विश्वादिं परं विद्धि चेश्वरम्।)
रजस्तमश्च सत्त्वं च विद्धि नारायणात्मकम्।
सोऽश्रमाणां फलं तात कर्मणस्तत् फलं विदुः ॥ २४ ॥
उन्हें तुम सम्पूर्ण भूतस्वरूप, इस जगत्का आदिकारण और परमेश्वर समझो। रजोगुण, तमोगुण और सत्त्वगुण—इन तीनोंको नारायणमय ही मानो। तात ! समस्त आश्रमोंका फल वे ही हैं। विद्वान् पुरुष समस्त कर्मोंद्वारा प्राप्तव्य फल उन्हींको मानते हैं॥ २४॥
अकर्मणः फलं चैव स एव परमव्ययः।
छन्दांसि यस्य रोमाणि ह्यक्षरं च सरस्वती ॥ २५ ॥
कर्मोंका त्यागरूप जो संन्यास है, उसका फल भी वे ही अविनाशी परमात्मा हैं। वेद-मन्त्र उनके रोम हैं तथा प्रणव उनकी वाणी है॥ २५ ॥
बह्वाश्रयो बहुमुखो धर्मो हृदि समाश्रितः।
स ब्रह्म परमो धर्मस्तपश्च सदसच्च सः ॥ २६ ॥
बहुत-से वर्ण और आश्रम उनके आश्रय हैं, उनके अनेक मुख हैं। हृदयमें आश्रित धर्म भी उन्हींका स्वरूप है। वे ही ब्रह्म हैं। वे ही आत्मदर्शनरूप परम धर्म हैं। वे ही तप और सदसत्स्वरूप हैं॥ २६ ॥
श्रुतिशास्त्रग्रहोपेतः षोडशर्त्विक् क्रतुश्च सः।
पितामहश्च विष्णुश्च सोऽश्विनौ स पुरन्दरः।
मित्रोऽथ वरुणश्चैव यमोऽथ धनदस्तथा ॥ २७ ॥
श्रुति (वेद), शास्त्र और सोमपात्रसहित सोलह* ऋत्विजोंवाला यज्ञ भी वे ही हैं। वे ही ब्रह्मा, विष्णु, दोनों अश्विनीकुमार, इन्द्र,
* सोलह ऋत्विजोंके नाम इस प्रकार हैं—१. ब्रह्मा, २. ब्राह्मणाच्छंसी, ३. आग्नीध्र और ४. पोता—ये चार ऋत्विज सम्पूर्ण वेदोंके ज्ञाता होते हैं। ५. होता, ६. मैत्रावरुण, ७. अच्छावाक और ८. ग्रावस्तोता—ये चार ऋत्विज ऋग्वेदी होते हैं। ९. अध्वर्यु, १०. प्रतिप्रस्थाता, ११. नेष्टा और १२. उन्नेता—ये चार यजुर्वेदी होते हैं। १३. उद्गाता, १४. प्रस्तोता, १५. प्रतिहर्ता तथा १६. सुब्रह्मण्य—ये सामवेदके गायक होते हैं।