गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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मध्यम होता है। रक्तवर्ण विशेष रूपसे सहन करनेयोग्य होता है। हरिद्राकी-सी कान्ति सुख देनेवाली होती है और शुक्लवर्ण अत्यन्त सुखदायक होता है॥ ३३॥
परं तु शुक्लं विमलं विशोकं गतक्लमं सिद्ध्यति दानवेन्द्र। गत्वा तु योनिप्रभवाणि दैत्य सहस्रशः सिद्धिमुपैति जीवः॥ ३४॥
दानवराज! शुक्लवर्ण निर्मल, शोकहीन, परिश्रमशून्य होनेके कारण सिद्धिकारक होता है। दितिकुलनन्दन! जीव सहस्रों योनियोंमें जन्म ग्रहण करनेके बाद मनुष्ययोनिमें आकर कभी सिद्धि-लाभ करता है॥ ३४॥
गतिं च यां दर्शनमाह देवो गत्वा शुभं दर्शनमेव चापि। गतिः पुनर्वर्णकृता प्रजानां वर्णस्तथा कालकृतोऽसुरेन्द्र॥ ३५॥
असुरेन्द्र! देवराज इन्द्रने मंगलमय तत्त्वज्ञान प्राप्त करके हमारे निकट जिस गति और दर्शन-शास्त्रका वर्णन किया है, वह प्राणियोंकी वर्णजनित गति है अर्थात् शुक्लवर्णवालोंको वही सिद्धि प्राप्त होती है। वह वर्ण कालकृत माना गया है॥ ३५॥
शतं सहस्राणि चतुर्दशैव परागतिर्जीवगणस्य दैत्य। आरोहणं तत्कृतमेव विद्धि स्थानं तथा निःसरणं च तेषाम्॥ ३६॥
दैत्यप्रवर! इस जगत्में समस्त जीव-समुदायकी परागति चौदह लाख बतायी गयी है। (पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय तथा मन,