गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
पृष्ठ 24, कुल 675 में से
संदर्भ में पढ़ें* गणेशगीता * २३
शिक्षा कल्पवृक्षके समान तुम्हारी इष्टसिद्धिको देनेवाली हो ॥ १० ॥
सुरांशचान्नेन प्रीणध्वं सुरास्ते प्रीणयन्तु वः। लभत्वं परमं स्थानमन्योन्यप्रीणनात्स्थिरम् ॥ ११ ॥
तुम देवताओंको अन्नसे तृप्त करो, देवता तुमको (वर्षा आदिसे) प्रसन्न करें, इस प्रकार परस्पर वृद्धि करते हुए तुम और देवता सब श्रेष्ठ स्थानको प्राप्त हों ॥ ११ ॥
इष्टा देवाः प्रदास्यन्ति भोगानिष्टान् सुतर्पिताः। तैर्दत्तांस्ताननरस्तेभ्योऽदत्त्वा भुङ्क्ते स तस्करः ॥ १२ ॥
देवता प्रसन्न होकर तुम्हारे मनोवांछित मनोरथोंको पूर्ण करेंगे, उन देवताओंके दिये पदार्थोंसे उनकी आराधना किये बिना जो भोग भोगता है, वह चोर है ॥ १२ ॥
हुतावशिष्टभोक्तारो मुक्ताः स्युः सर्वपातकैः। अदन्त्येनो महापापा आत्महेतोः पचन्ति ये ॥ १३ ॥
जो देवाराधनरूप यज्ञ करके अवशिष्ट अन्नका भोजन करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त होते हैं और जो अपने निमित्त ही भोजन बनाते हैं, वे पापी मानो पापका ही भोजन करते हैं ॥ १३ ॥
ऊर्जो भवन्ति भूतानि देवादन्नस्य सम्भवः। यज्ञाच्च देवसम्भूतिस्तदुत्पत्तिश्च वैधतः ॥ १४ ॥
अन्नसे ही प्राणी उत्पन्न होते हैं, अन्न वर्षासे उत्पन्न होता है, वर्षा यज्ञसे उत्पन्न होती है और कर्मसे यज्ञकी उत्पत्ति होती है ॥ १४ ॥
ब्रह्मणो वैधमुत्पन्नं मत्तो ब्रह्मसमुद्भवः। अतो यज्ञे च विश्वस्मिन् स्थितं मां विद्धि भूमिप ॥ १५ ॥
कर्म ब्रह्मासे उत्पन्न होता है और ब्रह्मा मुझसे उत्पन्न होते हैं— इस कारण हे राजन्! आप इस यज्ञमें और विश्वमें स्थित मुझे ही जानिये ॥ १५ ॥