भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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२६२ * गीता-संग्रह *


देवता, मनुष्य और पशु आदि [उसका अन्त हो जानेपर] उस सनातन परमात्मामें लीन हो जाते हैं॥ १७॥
हरिममरवरार्चिताङ्घ्रिपद्मं
प्रणमति यः परमार्थतो हि मर्त्यः।
तमपगतसमस्तपापबन्धं
व्रज परिहृत्य यथाग्निमाज्यसिक्तम्॥ १८॥
जो भगवान्‌के सुरवरवन्दित चरणकमलोंकी परमार्थबुद्धिसे वन्दना करता है, घृताहुतिसे प्रज्वलित अग्निके समान समस्त पाप-बन्धनसे मुक्त हुए उस पुरुषको तुम दूरहीसे छोड़कर निकल जाना॥ १८॥
इति यमवचनं निशम्य पाशी
यमपुरुषस्तमुवाच धर्मराजम्।
कथय मम विभो समस्तधातु-
र्भवति हरेः खलु यादृशोऽस्य भक्तः॥ १९॥
यमराजके ऐसे वचन सुनकर पाशहस्त यमदूतने उनसे पूछा— ‘प्रभो! सबके विधाता भगवान् हरिका भक्त कैसा होता है, यह आप मुझसे कहिये’॥ १९॥

यम उवाच
न चलति निजवर्णधर्मतो यः
सममतिरात्मसुहृद्विपक्षपक्षे ।
न हरति न च हन्ति किञ्चिदुच्चैः
सितमनसं तमवेहि विष्णुभक्तम्॥ २०॥
यमराज बोले— जो पुरुष अपने वर्ण-धर्मसे विचलित नहीं होता, अपने सुहृद् और विपक्षियोंके प्रति समान भाव रखता है, बलपूर्वक किसीका द्रव्य हरण नहीं करता, और न किसी जीवकी हिंसा ही करता है, उस निर्मलचित्त व्यक्तिको भगवान् विष्णुका भक्त जानो॥ २०॥