भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

DevanagariHindipublished675 पृष्ठ

पृष्ठ 273, कुल 675 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 273

२७२ * गीता-संग्रह *


ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं सौभाग्यं रूपमुत्तमम्।
तपसा लभ्यते सर्वं मनसा यद्यदिच्छति ॥ १३ ॥

ज्ञान, विज्ञान, आस्तिकता, सौभाग्य तथा उत्तम रूप तपस्यासे उपलब्ध होते हैं। इतना ही नहीं, मनुष्य अपने मनसे जो-जो वस्तु पाना चाहता है, वह सब तपस्यासे प्राप्त हो जाती है॥१३॥

नास्ति विष्णुसमं ध्येयं तपो नानशनात्परं।
नास्त्यारोग्यसमं धन्यं नास्ति गङ्गासमा सरित् ॥ १४॥

विष्णुके समान कोई ध्येय नहीं है, निराहार रहनेसे बढ़कर कोई तपस्या नहीं है, आरोग्यके समान कोई बहुमूल्य वस्तु नहीं है और गंगाजीके तुल्य दूसरी कोई नदी नहीं है॥ १४॥

न सोऽस्ति बान्धवः कश्चिद्विष्णुं मुक्त्वा जगद्गुरुम्।
अधश्चोर्ध्वं हरिश्चाग्रे देहेन्द्रियमनोमुखे ॥ १५ ॥

जगद्गुरु भगवान् विष्णुको छोड़कर दूसरा कोई बान्धव नहीं है। नीचे-ऊपर, आगे, देह, इन्द्रिय, मन तथा मुख—सबमें और सर्वत्र भगवान् श्रीहरि विराजमान हैं॥ १५॥

इत्येवं संस्मरन् प्राणान् यस्त्यजेत्स हरिर्भवेत्।
यत्तद् ब्रह्म यतः सर्वं यत्सर्वं तस्य संस्थितम् ॥ १६ ॥
अग्राह्यकमनिर्देश्यं सुप्रतिष्ठञ्च यत्परम्।
परापरस्वरूपेण विष्णुः सर्वहृदि स्थितः ॥ १७ ॥
यज्ञेशं यज्ञपुरुषं केचिदिच्छन्ति तत्परम्।
केचिद्विष्णुं हरं केचित् केचिद् ब्रह्माणमीश्वरम् ॥ १८ ॥
इन्द्रादिनामभिः केचित् सूर्यं सोमञ्च कालकम्।
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं जगद्विष्णुं वदन्ति च ॥ १९ ॥

इस प्रकार भगवान्‌का चिन्तन करते हुए जो प्राणोंका परित्याग करता है, वह साक्षात् श्रीहरिके स्वरूपमें मिल जाता है। वह जो