गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७४ * गीता-संग्रह *
यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा ॥ २३ ॥
न सत्पदमवाप्नोति संसारञ्चाधिगच्छति ।
यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा ॥ २४ ॥
स तत्पदमवाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ।
जो बुद्धिरूप सारथि अविवेकी होता है, जो अपने मनरूपी लगामको कसकर नहीं रखता, वह उत्तमपद परमात्माको नहीं प्राप्त होता, संसाररूपी गर्तमें गिरता है। परंतु जो विवेकी होता है और मनको काबूमें रखता है, वह उस परमपदको प्राप्त होता है, जिससे वह फिर जन्म नहीं लेता ॥ २३-२४ ३/१ ॥
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः ॥ २५ ॥
सोऽध्वानं परमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ।
जो मनुष्य विवेकयुक्त बुद्धिरूप सारथिसे सम्पन्न और मनरूपी लगामको काबूमें रखनेवाला होता है, वही संसाररूपी मार्गको पार करता है, जहाँ विष्णुका परमपद है ॥ २५ ३/१ ॥
इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः ॥ २६ ॥
मनसस्तु परा बुद्धिः बुद्धेरात्मा महान् परः ।
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः ॥ २७ ॥
पुरुषान्न परं किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गतिः ।
इन्द्रियोंकी अपेक्षा उनके विषय पर हैं, विषयोंसे परे मन है, मनसे परे बुद्धि है, बुद्धिसे परे महान् आत्मा (महत्तत्त्व) है, महत्तत्त्वसे परे अव्यक्त (मूलप्रकृति) है और अव्यक्तसे परे पुरुष (परमात्मा) है। पुरुषसे परे कुछ भी नहीं है, वही सीमा है, वही परमगति है ॥ २६-२७ ३/१ ॥
एषु सर्वेषु भूतेषु गूढात्मा न प्रकाशते ॥ २८ ॥
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ।
यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञः तद्यच्छेज्ज्ञानमात्मनि ॥ २९ ॥