गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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कहा। इसके उपरान्त परम्परासे प्राप्त हुए इस योगको महर्षिगण जानते रहे ॥ २ ॥
कालेन बहुना चायं नष्टः स्याच्चरमे युगे। अश्रद्धेयो ह्यविश्वास्यो विगीतव्यश्च भूमिप ॥ ३ ॥
हे राजन्! कलियुगमें यह बहुत काल बीत जानेसे नष्ट हो गया तथा इसे श्रद्धा-विश्वासके अयोग्य तथा निन्दनीय समझा गया ॥ ३ ॥
एवं पुरातनं योगं श्रुतवानसि मन्मुखात्। गुह्याद्गुह्यतरं वेदरहस्यं परमं शुभम् ॥ ४ ॥
अब फिर तुमने मेरे मुखसे इस पुरातन योगको सुना है, यह गुप्त-से-गुप्त, अत्यन्त कल्याणकारक और सम्पूर्ण वेदोंका सार है ॥ ४ ॥
वरेण्य उवाच
साम्प्रतं चावतीर्णोऽसि गर्भतस्त्वं गजानन। प्रोक्तवान् कथमेतं त्वं विष्णवे योगमुत्तमम् ॥ ५ ॥
राजा वरेण्य बोले—हे गजानन! आप तो इस समय गर्भसे उत्पन्न हुए हैं, फिर आपने विष्णुसे यह उत्तम योग किस प्रकारसे वर्णन किया ? ॥ ५ ॥
गणेश उवाच
अनेकानि च ते जन्मान्यतीतानि ममापि च। संस्मरे तानि सर्वाणि न स्मृतिस्तव वर्तते ॥ ६ ॥
गणेशजी बोले—[हे राजन्!] मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म बीत चुके हैं, मैं उन सबको जानता हूँ, परंतु तुम नहीं जानते ॥ ६ ॥
मत्त एव महाबाहो जाता विष्ण्वादयः सुराः। मय्येव लयं यान्ति प्रलयेषु युगे युगे ॥ ७ ॥
हे महाबाहो! मुझसे ही विष्णु आदि देवता उत्पन्न हुए हैं और युग-युगमें प्रलयके समय मुझमें ही लय हो जाते हैं ॥ ७ ॥