गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
पृष्ठ 313, कुल 675 में से
संदर्भ में पढ़ें३१२ * गीता-संग्रह *
आगे—परमार्थके पथपर बढ़ जाते हैं; किंतु जो पापी हैं, वे उसे नहीं काट पाते॥ ३७॥
रूपकूलां मनःस्रोतां स्पर्शद्वीपां रसावहाम्। गन्धपङ्कां शब्दजलां स्वर्गमार्गदुरावहाम्॥ ३८॥ क्षमारित्रां सत्यमयीं धर्मस्थैर्यवटारकाम्। त्यागवाताध्वगां शीघ्रां नौतार्यां तां नदीं तरेत्॥ ३९॥
यह संसार एक नदीके समान है, जिसका उपादान या उद्गम सत्य है, रूप इसका किनारा, मन स्रोत, स्पर्श द्वीप और रस ही प्रवाह है, गन्ध उस नदीका कीचड़, शब्द जल और स्वर्गरूपी दुर्गम घाट है। शरीररूपी नौकाकी सहायतासे उसे पार किया जा सकता है। क्षमा इसको खेनेवाली लग्गी और धर्म इसको स्थिर करनेवाली रस्सी (लंगर) है। यदि त्यागरूपी अनुकूल पवनका सहारा मिले तो इस शीघ्रगामिनी नदीको पार किया जा सकता है। इसे पार करनेका अवश्य प्रयत्न करे॥ ३८-३९॥
त्यज धर्ममधर्मं च तथा सत्यानृते त्यज। उभे सत्यानृते त्यक्त्वा येन त्यजसि तं त्यज॥ ४०॥
धर्म और अधर्मको छोड़ो। सत्य और असत्यको भी त्याग दो और उन दोनोंका त्याग करके जिसके द्वारा त्याग करते हो, उसको भी त्याग दो॥ ४०॥
त्यज धर्ममसङ्कल्पादधर्मं चाप्यलिप्सया। उभे सत्यानृते बुद्ध्या बुद्धिं परमनिश्चयात्॥ ४१॥
संकल्पके त्यागद्वारा धर्मको और लिप्साके अभावद्वारा अधर्मको भी त्याग दो। फिर बुद्धिके द्वारा सत्य और असत्यका त्याग करके परमतत्त्वके निश्चयद्वारा बुद्धिको भी त्याग दो॥ ४१॥