भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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  • गणेशगीता * ३३

हैं। वे मुझे अनादि, ईश्वर, नित्य और कर्मोंके गुणोंसे अलिप्त मानते हैं ॥ १९ ॥

निरीहं योऽभिजानाति कर्म बध्नाति नैव तम्।
चक्रुः कर्माणि बुद्ध्वैवं पूर्वं पूर्वं मुमुक्षवः ॥ २० ॥
जो मुझे इच्छारहित जानता है, उसको कर्मबन्धन नहीं होता। ऐसा जानकर पूर्वमें मुमुक्षुजन कर्म करते थे ॥ २० ॥

वासनासहितादाद्यात्संसारकारणाद्दृढात् ।
अज्ञानबन्धनाजन्तुर्बुद्ध्वाय मुच्यतेऽखिलात् ॥ २१ ॥
वासना जो कि संसारका मूल और दृढ़ कारण है, और वही अज्ञानका बन्धन है, इसे जानकर प्राणी सबसे मुक्त हो जाता है ॥ २१ ॥

तदकर्म च कर्मापि कथयाम्यधुना तव।
यत्र मौनं गता मोहादृषयो बुद्धिशालिनः ॥ २२ ॥
क्या कर्म और क्या अकर्म है, यह मैं अब तुमसे कहता हूँ। इसके जाननेमें बुद्धिमान् ऋषिगण भी मोहको प्राप्त होकर मौन रह गये हैं ॥ २२ ॥

तत्त्वं मुमुक्षुणा ज्ञेयं कर्माकर्मविकर्मणाम्।
त्रिविधानीह कर्माणि सुनिम्नैषां गतिः प्रिय ॥ २३ ॥
हे प्रिय! कर्म, अकर्म और विकर्मका तत्त्व मुक्तिकी इच्छा करनेवालोंको जानना आवश्यक है, वे तीनों ही कर्म हैं। इनकी गति जानना महाकठिन है ॥ २३ ॥

क्रियायामक्रियाज्ञानमक्रियायां क्रियामतिः।
यस्य स्यात्स हि मर्त्येऽस्मिँल्लोके मुक्तोऽखिलार्थकृत् ॥ २४ ॥
क्रियामें अक्रियाका ज्ञान और अक्रियामें क्रियाकी बुद्धि जिसकी होती है, वही इस लोकमें सभी कर्मोंका करनेवाला होकर भी मुक्त हो जाता है ॥ २४ ॥

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