भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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  • उत्तरगीता * ३३९

मम कौतूहलं त्वस्ति तेष्वर्थेषु पुनः पुनः। भवांस्तु द्वारकां गन्ता नचिरादिव माधव॥ ७॥ माधव! उन विषयोंको सुननेके लिये मेरे मनमें बारम्बार उत्कण्ठा होती है। इधर आप जल्दी ही द्वारका जानेवाले हैं; अतः पुनः वह सब विषय मुझे सुना दीजिये॥ ७॥

वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु तं कृष्णः फाल्गुनं प्रत्यभाषत। परिष्वज्य महातेजा वचनं वदतां वरः॥ ८॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! अर्जुनके ऐसा कहनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें गलेसे लगाकर इस प्रकार उत्तर दिया॥ ८॥

वासुदेव उवाच श्रावितस्त्वं मया गुह्यं ज्ञापितश्च सनातनम्। धर्मं स्वरूपिणं पार्थ सर्वलोकांश्च शाश्वतान्॥ ९॥ अबुद्ध्या नाग्रहीर्यस्त्वं तन्मे सुमहदप्रियम्। न च साद्य पुनर्भूयः स्मृतिर्मे सम्भविष्यति॥ १०॥ श्रीकृष्ण बोले—अर्जुन! उस समय मैंने तुम्हें अत्यन्त गोपनीय ज्ञानका श्रवण कराया था, अपने स्वरूपभूत धर्म सनातन पुरुषोत्तमतत्त्वका परिचय दिया था और (शुक्ल-कृष्ण गतिका निरूपण करते हुए) सम्पूर्ण नित्य लोकोंका भी वर्णन किया था; किंतु तुमने जो अपनी नासमझीके कारण उस उपदेशको याद नहीं रखा, यह मुझे बहुत अप्रिय है। उन बातोंका अब पूरा-पूरा स्मरण होना सम्भव नहीं जान पड़ता॥ ९-१०॥

नूनमश्रद्दधानोऽसि दुर्मेधा ह्यसि पाण्डव। न च शक्यं पुनर्वक्तुमशेषेण धनञ्जय॥ ११॥ पाण्डुनन्दन! निश्चय ही तुम बड़े श्रद्धाहीन हो, तुम्हारी बुद्धि

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