गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
पृष्ठ 345, कुल 675 में से
संदर्भ में पढ़ें३४४ * गीता-संग्रह *
मातरो विविधा दृष्टाः पितरश्च पृथग्विधाः। सुखानि च विचित्राणि दुःखानि च मयानघ॥ ३३॥
अनघ! बहुत-से पिता और भाँति-भाँतिकी माताएँ देखी हैं। विचित्र-विचित्र सुख-दुःखोंका अनुभव किया है॥ ३३॥
प्रियैर्विवासो बहुशः संवासश्चाप्रियैः सह। धननाशश्च सम्प्राप्तो लब्ध्वा दुःखेन तद् धनम्॥ ३४॥
कितनी ही बार मुझसे प्रियजनोंका वियोग और अप्रियजनोंका संयोग हुआ है। जिस धनको मैंने बहुत कष्ट सहकर कमाया था, वह मेरे देखते-देखते नष्ट हो गया॥ ३४॥
अवमानाः सुकष्टाश्च राजतः स्वजनात् तथा। शारीरा मानसा वापि वेदना भृशदारुणाः॥ ३५॥
राजा और स्वजनोंकी ओरसे मुझे कई बार बड़े-बड़े कष्ट और अपमान उठाने पड़े हैं। तन और मनकी अत्यन्त भयंकर वेदनाएँ सहनी पड़ी हैं॥ ३५॥
प्राप्ता विमाननाश्चोग्रा वधबन्धाश्च दारुणाः। पतनं निरये चैव यातनाश्च यमक्षये॥ ३६॥
मैंने अनेक बार घोर अपमान, प्राणदण्ड और कड़ी कैदकी सजाएँ भोगी हैं। मुझे नरकमें गिरना और यमलोकमें मिलनेवाली यातनाओंको सहना पड़ा है॥ ३६॥
जरा रोगाश्च सततं व्यसनानि च भूरिशः। लोकेऽस्मिन्ननुभूतानि द्वन्द्वजानि भृशं मया॥ ३७॥
इस लोकमें जन्म लेकर मैंने बारम्बार बुढ़ापा, रोग, व्यसन और राग-द्वेषादि द्वन्द्वोंके प्रचुर दुःख सदा ही भोगे हैं॥ ३७॥