गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- उत्तरगीता * ३५९
एवं सत्सु सदा पश्येत् तत्राप्येषा ध्रुवा स्थितिः। आचारो धर्ममाचष्टे यस्मिञ्शान्ता व्यवस्थिताः ॥ १९॥
सत्पुरुषोंमें सदा ही इस प्रकारका धार्मिक आचरण देखा जाता है। उन्हींमें धर्मकी अटल स्थिति होती है। सदाचार ही धर्मका परिचय देता है। शान्तचित्त महात्मा पुरुष सदाचारमें ही स्थित रहते हैं ॥ १९॥
तेषु तत् कर्म निक्षिप्तं यः स धर्मः सनातनः। यस्तं समभिपद्येत न स दुर्गतिमाप्नुयात् ॥ २०॥
उन्हींमें पूर्वोक्त दान आदि कर्मोंकी स्थिति है। वे ही कर्म सनातन धर्मके नामसे प्रसिद्ध हैं। जो उस सनातन धर्मका आश्रय लेता है, उसे कभी दुर्गति नहीं भोगनी पड़ती है ॥ २०॥
अतो नियम्यते लोकः प्रच्यवन् धर्मवर्त्मसु। यश्च योगी च मुक्तश्च स एतेभ्यो विशिष्यते ॥ २१॥
इसीलिये धर्ममार्गसे भ्रष्ट होनेवाले लोगोंका नियन्त्रण किया जाता है। जो योगी और मुक्त है, वह अन्य धर्मात्माओंकी अपेक्षा श्रेष्ठ होता है ॥ २१॥
वर्तमानस्य धर्मेण शुभं यत्र यथा तथा। संसारतारणं ह्यस्य कालेन महता भवेत् ॥ २२॥
जो धर्मके अनुसार बर्ताव करता है, वह जहाँ जिस अवस्थामें हो, वहाँ उसी स्थितिमें उसको अपने कर्मानुसार उत्तम फलकी प्राप्ति होती है और वह धीरे-धीरे अधिक काल बीतनेपर संसार-सागरसे तर जाता है ॥ २२॥
एवं पूर्वकृतं कर्म नित्यं जन्तुः प्रपद्यते। सर्वं तत्कारणं येन विकृतोऽयमिहागतः ॥ २३॥
इस प्रकार जीव सदा अपने पूर्वजन्मोंमें किये हुये कर्मोंका फल भोगता है। यह आत्मा निर्विकार ब्रह्म होनेपर भी विकृत होकर इस जगत्में जो जन्म धारण करता है, उसमें कर्म ही कारण है ॥ २३॥