गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* उत्तरगीता * ३७५
उसके साधनके उपाय भी बतलाये हैं और सिद्धि, फल, मोक्ष तथा दुःखके स्वरूपका भी निर्णय किया है॥ ६३॥
नातः परं सुखं त्वन्यत् किञ्चित् स्याद् भरतर्षभ।
बुद्धिमाञ्श्रद्दधानश्च पराक्रान्तश्च पाण्डव॥ ६४॥
यः परित्यज्यते मर्त्यो लोकसारमसारवत्।
एतैरुपायैः स क्षिप्रं परां गतिमवाप्नुते॥ ६५॥
भरतश्रेष्ठ! इससे बढ़कर दूसरा कोई सुखदायक धर्म नहीं है। पाण्डुनन्दन! जो कोई बुद्धिमान्, श्रद्धालु और पराक्रमी मनुष्य लौकिक सुखको सारहीन समझकर उसे त्याग देता है, वह उपर्युक्त इन उपायोंके द्वारा बहुत शीघ्र परम गतिको प्राप्त कर लेता है॥ ६४-६५॥
एतावदेव वक्तव्यं नातो भूयोऽस्ति किञ्चन।
षण्मासान् नित्ययुक्तस्य योगः पार्थ प्रवर्तते॥ ६६॥
पार्थ! इतना ही कहनेयोग्य विषय है। इससे बढ़कर कुछ भी नहीं है। जो छः महीनेतक निरन्तर योगका अभ्यास करता है, उसका योग अवश्य सिद्ध हो जाता है॥ ६६॥
॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि उत्तरगीतायां चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
॥ उत्तरगीता सम्पूर्णा॥