गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८२ * गीता-संग्रह *
आत्मानुसन्धानमें लगा हुआ बुद्धिमान् पुरुष सम्पूर्ण कर्मोंका सर्वथा त्याग कर दे; क्योंकि विद्याका विरोधी होनेके कारण कर्मका उसके साथ समुच्चय नहीं हो सकता ॥ १४ ॥
यावच्छरीरादिषु माययात्मधी- स्तावद्विधेयो विधिवादकर्मणाम्। नेतीति वाक्यैरखिलं निषिध्य त- ज्ज्ञात्वा परात्मानमथ त्यजेत्क्रियाः ॥ १५ ॥
जबतक मायासे मोहित रहनेके कारण मनुष्यका शरीरादिमें आत्मभाव है, तभीतक उसे वैदिक कर्मानुष्ठान कर्तव्य है। 'नेति-नेति' आदि वाक्योंसे सम्पूर्ण अनात्मवस्तुओंका निषेध करके अपने परमात्म-स्वरूपको जान लेनेपर फिर उसे समस्त कर्मोंको छोड़ देना चाहिये ॥ १५ ॥
यदा परात्मात्मविभेदभेदकं विज्ञानमात्मन्यवभाति भास्वरम्। तदैव माया प्रविलीयतेऽञ्जसा सकारका कारणमात्मसंसृतेः ॥ १६ ॥
जिस समय परमात्मा और जीवात्माके भेदको दूर करनेवाला प्रकाशमय विज्ञान अन्तःकरणमें स्पष्टतया भासित होने लगता है। उसी समय आत्माके लिये संसार-प्राप्तिकी कारण माया अनायास ही कारकादिके सहित लीन हो जाती है ॥ १६ ॥
श्रुतिप्रमाणाभिविनाशिता च सा कथं भविष्यत्यपि कार्यकारिणी। विज्ञानमात्रादमलाद्वितीयत- स्तस्मादविद्या न पुनर्भविष्यति ॥ १७ ॥
श्रुति-प्रमाणसे उसके नष्ट कर दिये जानेपर फिर वह अपना कार्य करनेमें समर्थ भी किस प्रकार हो सकेगी? क्योंकि परमार्थतत्त्व