गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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न संसारं प्रपश्यन्ति पूर्वेऽपि ब्रह्मवादिनः । गुह्याद् गुह्यतमं साक्षाद् गोपनीयं प्रयत्नतः । वंशे भक्तिमतो ह्यस्य भवन्ति ब्रह्मवादिनः ॥ ४ ॥
वे पुरातन ब्रह्मज्ञानी संसारको (सत्य) नहीं देखते। यह ज्ञान गुह्यसे भी परम गुह्य है और प्रयत्नपूर्वक गोपनीय है। इस (विज्ञानवेत्ता)-के वंशमें जन्म लेनेवाले भी भक्तिमान् ब्रह्मवादी होते हैं॥ ४ ॥
आत्मा यः केवलः स्वच्छः शान्तः सूक्ष्मः सनातनः ॥ ५ ॥ अस्ति सर्वान्तरः साक्षाच्चिन्मात्रस्तमसः परः । सोऽन्तर्यामी स पुरुषः स प्राणः स महेश्वरः ॥ ६ ॥
आत्मा केवल, स्वच्छ, शान्त, सूक्ष्म और सनातन है। वह (आत्मा) सबके अन्दर स्पष्ट, प्रकाशमान और चिन्मय रूपसे स्थित है। वही अन्तर्यामी पुरुष है, वही प्राण है और वही परमेश्वर है॥ ५-६ ॥
स कालाग्निस्तद्व्यक्तं सद्यो वेदयति श्रुतिः । अस्माद्विजायते विश्वमत्रैव प्रविलीयते ॥ ७ ॥
वह कालाग्नि है, वही अव्यक्त है और श्रुति (शब्दप्रमाणसे) उसका ज्ञान कराती है। संसारकी उत्पत्ति और लय उसीमें होता है ॥ ७ ॥
मायावी मायया बद्धः करोति विविधास्तनूः । न चाप्ययं संसरति न च संसारयेत्प्रभुः ॥ ८ ॥
वह सर्वसमर्थ मायावी अपनी मायासे अनेक रूप (शरीर) धारण करता है। यह कहीं आता-जाता नहीं और न किसीको संचालित करता है ॥ ८ ॥
नायं पृथ्वी न सलिलं न तेजः पवनो नभः । न प्राणो न मनो व्यक्तं न शब्दः स्पर्श एव च ॥ ९ ॥