गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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यथा स्वप्रभया भाति केवलः स्फटिकोपलः। उपाधिहीनो विमलस्तथैवात्मा प्रकाशते ॥ २७ ॥ जैसे स्फटिक-मणि अपनी (स्वच्छ) प्रभासे प्रकाशित रहती है, उसी प्रकार उपाधिरहित निर्मल आत्मा भी स्वयंप्रकाशित रहता है ॥ २७ ॥
ज्ञानस्वरूपमेवाहुर्जगदेतद्विचक्षणाः । अर्थस्वरूपमेवाज्ञाः पश्यन्त्यन्ये कुबुद्धयः ॥ २८ ॥ बुद्धिमान् लोग इस संसारको ज्ञान-स्वरूप (आभासमात्र) कहते हैं, किंतु मंदबुद्धि (मूर्ख) इसे यथार्थ (सच्चा) समझते हैं ॥ २८ ॥
कूटस्थो निर्गुणो व्यापी चैतन्यात्मा स्वभावतः। दृश्यते ह्यर्थरूपेण पुरुषैर्भ्रान्तदृष्टिभिः ॥ २९ ॥ यथा संलक्ष्यते व्यक्तः केवलः स्फटिको जनैः। रक्तिकाव्यवधानेन तद्वत्परमपूरुषः ॥ ३० ॥ भ्रान्तचित्त लोगोंको कूटस्थ, निर्गुण, सर्वव्यापी, स्वभावतः चैतन्यरूप आत्मतत्त्व भी पदार्थ-जैसा प्रतीत होता है। जैसे लोग शुद्ध स्फटिक मणिको भी लाल पदार्थके संसर्गसे लाल ही देखते हैं, उसी प्रकार परमात्मतत्त्वके प्रति भी भ्रान्ति रहती है ॥ २९-३० ॥
तस्मादात्माक्षरः शुद्धो नित्यः सर्वगतोऽव्ययः। उपासितव्यो मन्तव्यः श्रोतव्यश्च मुमुक्षुभिः ॥ ३१ ॥ इसलिये मुमुक्षु लोगोंको अक्षर, शुद्ध, सनातन, सर्वव्यापी, अव्यय, आत्मतत्त्वका ही चिन्तन, मनन, श्रवण तथा अनुसन्धान करना चाहिये ॥ ३१ ॥
यदा मनसि चैतन्यं भाति सर्वत्रगं सदा। योगिनोऽव्यवधानेन तदा सम्पद्यते स्वयम् ॥ ३२ ॥ जब योगसाधकके मनमें सदा सर्वव्यापी चैतन्यका प्रकाश निरन्तर