भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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४०८ * गीता-संग्रह *

सम्पूर्ण कामनाओं, रसों और गन्धादि विषयोंका परमाधार, अजर- अमर, अन्तर्यामी, सनातन और सर्वत्र हाथ-पैरोंसे स्थित आत्मस्वरूप हूँ॥ ४७-४८॥ अपाणिपादो जवनो ग्रहीता हृदि संस्थितः। अचक्षुरपि पश्यामि तथाकर्णः शृणोम्यहम्॥ ४९॥ वेदाहं सर्वमेवेदं न मां जानाति कश्चन। प्राहुर्महान्तं पुरुषं मामेकं तत्त्वदर्शिनः ॥ ५० ॥ बिना हाथ-पैरोंवाला होकर भी मैं शीघ्रगामी हूँ और सब कुछ ग्रहण करता हूँ, (सबके) हृदयमें रहता हूँ। मैं बिना आँखोंके देख सकता हूँ और बिना कानके सुन सकता हूँ। मैं यह सब जानता हूँ, पर मुझे कोई नहीं जानता। तत्त्वदर्शी मुझे एकमात्र महान् पुरुष (सत्ता) कहते हैं॥ ४९-५०॥ निर्गुणामलरूपस्य यत्तदैश्वर्यमुत्तमम्। यन्न देवा विजानन्ति मोहिता मायया मम॥ ५१॥ मेरे निर्गुण, निर्मल स्वरूप और उत्तम ऐश्वर्यको देवता भी नहीं जान पाते; क्योंकि वे मेरी मायासे मोहित रहते हैं॥ ५१॥ यन्मे गुह्यतमं देहं सर्वगं तत्त्वदर्शिनः। प्रविष्टा मम सायुज्यं लभन्ते योगिनोऽव्ययम् ॥ ५२ ॥ मेरा जो सर्वव्यापी परम गुह्य अव्यय स्वरूप है, उसमें तत्त्वदर्शी योगीजन सायुज्य मुक्ति प्राप्त करके प्रविष्ट होते हैं॥ ५२॥ येषां हि न समापन्ना माया वै विश्वरूपिणी। लभन्ते परमं शुद्धं निर्वाणं ते मया सह॥ ५३॥ जिन्हें यह विश्वव्यापी माया नहीं छूती, वे योगीजन परम पवित्र निर्वाणपदको मेरे साथ प्राप्त करते हैं॥ ५३॥

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