गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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- गीता-संग्रह *
उसके अविवेकसे ही पुरुषको इस संसारकी प्राप्ति होती है॥ १५॥ स चाविवेकः प्रकृतौ सङ्गात्कालेन सोऽभवत्। कालः सृजति भूतानि कालः संहरते प्रजाः ॥ १६ ॥ सर्वे कालस्य वशगा न कालः कस्यचिद्वशे। सोऽन्तरा सर्वमेवेदं नियच्छति सनातनः ॥ १७ ॥ वह अविवेक (दीर्घ कालतक) प्रकृतिका संग करनेके कारण हो जाता है। काल ही सभी प्राणी-पदार्थोंका सृजन करता है और वही सृष्टिका संहार भी करता है। सभी कालके वशीभूत रहते हैं। काल किसीके वशमें नहीं होता। वही सनातन सबके भीतर प्रवेश करके सबका नियन्त्रण करता है॥ १६-१७॥ प्रोच्यते भगवान् प्राणः सर्वज्ञः पुरुषः परः। सर्वेन्द्रियेभ्यः परमं मनः प्राहर्मनीषिणः ॥ १८ ॥ मनसश्चाप्यहङ्कारमहङ्कारान्महान् परः। महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः ॥ १९ ॥ वही भगवान् प्राण, सर्वज्ञ और परम पुरुष कहा जाता है। विज्ञजनोंद्वारा मनको सभी इन्द्रियोंसे परे कहा गया है। मनसे परे अहंकार और अहंकारसे परे महत् तत्त्व, महत्से परे अव्यक्त और उससे परे पुरुष कहे जाते हैं॥ १८-१९॥ पुरुषाद्भगवान् प्राणस्तस्य सर्वमिदं जगत्। प्राणात्परतरं व्योम व्योमातीतोऽग्निरीश्वरः ॥ २० ॥ पुरुषसे परे भगवान् प्राण हैं। उन्हींका (विस्तार) यह सारा जगत् है। प्राणसे परे आकाश है और आकाशसे परे मैं अग्निरूपी परमेश्वर हूँ॥ २० ॥ सोऽहं सर्वत्रगः शान्तो ज्ञानात्मा परमेश्वरः। नास्ति मत्परमं भूतं मां विज्ञाय विमुच्यते ॥ २१ ॥ वह परमेश्वर मैं सर्वव्यापी, शान्त और ज्ञानस्वरूप हूँ। मुझसे परे कुछ नहीं है। मुझे जानकर जीव मुक्त हो जाता है॥ २१॥