गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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मुखसे निकले समस्त वेद उन्हें दिये थे॥ १५॥
अहमेव हि सर्वेषां योगिनां गुरुरव्ययः।
धार्मिकाणां च गोप्ताहं निहन्ता वेदविद्विषाम्॥ १६॥
मैं ही समस्त योगियोंका सनातन गुरु हूँ। धार्मिक लोगोंका मैं संरक्षण करता हूँ और वेदविरोधी (दुष्टों)-का संहारक हूँ॥ १६॥
अहं वै सर्वसंसारान्मोचको योगिनामिह।
संसारहेतुरेवाहं सर्वसंसारवर्जितः॥ १७॥
मैं ही समस्त योगियोंको संसारसे मुक्त करता हूँ। इस सृष्टिका कारण होकर भी मैं समस्त सृष्टिसे परे हूँ॥ १७॥
अहमेव हि संहर्ता स्रष्टाहं परिपालकः।
मायावी मामिका शक्तिर्माया लोकविमोहिनी॥ १८॥
मैं ही इस सृष्टिका स्रष्टा, पालक और संहारक हूँ। मैं ही मायापति हूँ और मेरी शक्ति माया (अविद्या) इस समस्त संसारको भ्रमित करती रहती है॥ १८॥
ममैव च परा शक्तिर्या सा विद्येति गीयते।
नाशयामि तया मायां योगिनां हृदि संस्थितः॥ १९॥
मेरी ही पराशक्ति विद्या कही जाती है। उससे मैं योगियोंके चित्तमें स्थित होकर माया (अविद्या)-का नाश करता हूँ॥ १९॥
अहं हि सर्वशक्तीनां प्रवर्तकनिवर्तकः।
आधारभूतः सर्वासां निधानममृतस्य च॥ २०॥
मैं ही समस्त शक्तियोंका प्रवर्तक और निवर्तक हूँ। मैं ही सबका अधिष्ठान और अमृतका निधान हूँ॥ २०॥
एका सर्वान्तरा शक्तिः करोति विविधं जगत्।
भूत्वा नारायणोऽनन्तो जगन्नाथो जगन्मयः॥ २१॥
एक सबके भीतर स्थित शक्ति ही अनन्त, नारायण, जगद्व्यापी,