गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- गणेशगीता * ४१
मनसा सकलं कर्म त्यक्त्वा योगी सुखं वसेत्।
न कुर्वन् कारयन् वापि नन्दञ्च्वभ्रे सुपत्तने ॥ १२ ॥
न क्रिया न च कर्तृत्वं कस्यचित्सृज्यते मया।
न क्रियाबीजसम्पर्कः शक्त्या तत्क्रियतेऽखिलम् ॥ १३ ॥
कस्यचित्पुण्यपापानि न स्पृशामि विभुर्नृप।
ज्ञानमूढा विमुह्यन्ते मोहेनावृतबुद्धयः ॥ १४ ॥
योगीको उचित है कि मनसे सम्पूर्ण कर्मोंको त्यागकर सुखसे रहे तथा उत्तम नगरमें आनन्दसे वास करता हुआ भी न कुछ करे, न कराये और ऐसा जाने कि न कोई क्रिया करता हूँ, न कोई कर्तृत्वपना मुझमें है, न मैं कोई निर्माण करता हूँ, न मेरा क्रियाके बीजसे सम्बन्ध है, यह सब कुछ शक्ति अर्थात् प्रकृतिसे स्वयं होता रहता है। हे राजन्! मैं विभु आत्मा किसीके पुण्य और पापोंको स्पर्श नहीं करता हूँ, मोहसे मलिन बुद्धिवाले अज्ञानी ही मोहको प्राप्त होते हैं ॥ १२-१४ ॥
विवेकेनात्मनोऽज्ञानं येषां नाशितमात्मना।
तेषां विकाशमायाति ज्ञानमादित्यवत्परम् ॥ १५ ॥
जिन्होंने विवेकके द्वारा स्वयं ही अपना अज्ञान नष्ट किया है, उनका ज्ञान सूर्यके समान परम प्रकाशित होता है ॥ १५ ॥
मन्निष्ठा मद्धियोऽत्यन्तं मच्चित्ता मयि तत्पराः।
अपुनर्भवमायान्ति विज्ञानान्नाशितैनसः ॥ १६ ॥
जिनकी निष्ठा और बुद्धि मुझमें ही है, जिनका चित्त मुझमें अत्यन्त आसक्त है और जो सदा मेरे परायण हैं, वे श्रेष्ठ ज्ञानद्वारा पापका नाश करके मुक्त हो जाते हैं ॥ १६ ॥
ज्ञानविज्ञानसंयुक्ते द्विजे गवि गजादिषु।
समेक्षणा महात्मानः पण्डिताः श्वपचे शुनि ॥ १७ ॥
महात्मा पण्डितजन ज्ञानविज्ञानयुक्त ब्राह्मण, गौ, हाथी आदि