भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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  • रामगीता ( २ ) * ४२१

योऽपि नारायणोऽनन्तो लोकानां प्रभवाव्ययः।
ममैव परमा मूर्तिः करोति परिपालनम्॥ १२॥
जो अनन्त लोकोंके स्वामी अव्यय नारायण हैं, वे मेरे ही परमस्वरूप हैं और सृष्टिका परिपालन करते हैं॥ १२॥

योऽन्तकः सर्वभूतानां रुद्रः कालात्मकः प्रभुः।
मदाज्ञयासौ सततं संहरत्येव मे तनुः॥ १३॥
जो भगवान् कालात्मक रुद्र हैं, वे सभीका अन्त करनेवाले तथा मेरे ही स्वरूप हैं। वे मेरी आज्ञासे निरन्तर (इस सृष्टिका) संहार करते रहते हैं॥ १३॥

हव्यं वहति देवानां कव्यं कव्याशिनामपि।
पाकं च कुरुते वह्निः सोऽपि मच्छक्तिचोदितः॥ १४॥
जो अग्निदेव देवताओंके लिये हव्य और पितृगणोंके लिये कव्य ले जाते हैं तथा अन्नादिको पकानेका कार्य करते हैं, वे मेरी ही शक्तिसे संचालित होते हैं॥ १४॥

भुक्तमाहारजातं यत्पचत्येतदहर्निशम्।
वैश्वानरोऽग्निर्भगवानीश्वरस्य नियोगतः॥ १५॥
भगवान् वैश्वानर अग्नि भी मुझ परमेश्वरके अनुशासनसे ही खाये हुए भोजनको रात-दिन पचाते हैं॥ १५॥

यो हि सर्वाम्भसां योनिर्वरुणो देवपुङ्गवः।
स सञ्जीवयते सर्वमीशस्यैव नियोगतः॥ १६॥
समस्त जलाशयोंके आदिकारण देवश्रेष्ठ वरुण मुझ परमेश्वरकी आज्ञासे ही सबको जीवन प्रदान करते हैं॥ १६॥

योऽन्तस्तिष्ठति भूतानां बहिर्देवो निरञ्जनः।
मदाज्ञयासौ भूतानां शरीराणि बिभर्ति हि॥ १७॥
जो निरंजन प्राणदेव प्राणियोंके भीतर और बाहर संचरण करते रहते हैं, वे मेरी ही आज्ञासे जीवोंका शरीर धारण करते हैं॥ १७॥

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