गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
DevanagariHindipublished675 पृष्ठ
पृष्ठ 430, कुल 675 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 430
* भगवतीगीता * ४२९
---
श्रोतुं समिष्यते त्वत्तो यतस्त्वं वेत्सि तत्त्वतः।
तद्वदस्व महादेव विस्तरेण महामते ॥ ३ ॥
परमेश्वर ! यद्यपि उन जगदम्बाके जन्म, कर्मादिकी कथा अनेक पुराणोंमें सुनी गयी है तथा ज्ञात भी है तथापि उसे मैं आपसे अच्छी तरह सुनना चाहता हूँ; क्योंकि आप इस वृत्तान्तको ठीक-ठीक जानते हैं। महामते ! महादेव ! इसलिये कृपाकर विस्तारपूर्वक वह कथा कहें ॥ २-३ ॥
*श्रीमहादेव उवाच*
त्रैलोक्यजननी दुर्गा ब्रह्मरूपा सनातनी।
प्रार्थिता गिरिराजेन तत्पत्न्या मेनयापि च ॥ ४ ॥
महोग्रतपसा पुत्रीभावेन मुनिपुङ्गव ।
प्रार्थिता च महेशेन सतीविरहदुःखिना ॥ ५ ॥
प्रययौ मेनकागर्भे पूर्णब्रह्ममयी स्वयम् ।
ततः शुभदिने मेना राजीवसदृशाननाम् ॥ ६ ॥
सुषुवे तनयां देवीं सुप्रभां जगदम्बिकाम् ।
ततोऽभवत्पुष्पवृष्टिः सर्वतो मुनिसत्तम ॥ ७ ॥
**श्रीमहादेवजी बोले**—मुनिश्रेष्ठ ! गिरिराज और उनकी पत्नी मेनाने त्रैलोक्यमाता, सनातनी और ब्रह्मरूपा दुर्गादेवीकी महान् उग्र तपस्या करके उन्हें पुत्रीरूपसे पानेकी प्रार्थना की थी। भगवान् शिवने भी सतीके विरहसे दुःखी होकर उन्हें प्राप्त करनेका अनुरोध किया था। अतः ब्रह्मरूपा जगदम्बिका स्वयं मेनाके गर्भमें आयीं। तदनन्तर देवी मेनाने शुभ दिनमें कमलके समान मुखवाली, सुन्दर प्रभावाली, जगन्माता भगवतीको पुत्रीरूपसे जन्म दिया। मुनिवर ! उस समय सर्वत्र पुष्पवृष्टि होने लगी ॥ ४-७ ॥