गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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तब जगदम्बाने अपने उस माहेश्वररूपको तिरोहित करके तत्क्षण ही दूसरा रूप प्रकट किया। मुनिश्रेष्ठ! उन सनातनी विश्वरूपा जगदम्बाकी आभा शरत्कालके चन्द्रमाके समान थी, सुन्दर मुकुटसे उनका मस्तक प्रकाशमान था। वे हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण किये हुए थीं। उनके तीन सुन्दर नेत्र थे। उन्होंने दिव्य वस्त्र, माला और गन्धानुलेप धारण कर रखा था। वे योगीन्द्रवृन्दसे वन्दनीय थीं, उनके चरणकमल अति सुन्दर थे तथा अपने हाथ, पैर, आँख, मुख, सिर आदि दिव्य विग्रहसे वे सभी दिशाओंको व्याप्त किये हुए थीं। इस प्रकारके परम अद्भुत उस रूपको देखकर हिमवान्ने अपनी कन्याको पुनः प्रणाम किया और विस्मयपूर्ण विकसित नेत्रोंसे उन्हें देखते हुए वे बोले— ॥ २६–३० ॥
हिमालय उवाच
मातस्त्वेदं परं रूपमैश्वरमुत्तमम्।
विस्मितोऽस्मि समालोक्य रूपमन्यत्प्रदर्शय ॥ ३१ ॥
त्वं यस्य सो ह्यशोच्यो हि धन्यश्च परमेश्वरि।
अनुगृहीष्व मातर्मां कृपया त्वां नमो नमः ॥ ३२ ॥
**हिमालय बोले—**माता! आपका यह श्रेष्ठ रूप भी परम ऐश्वर्यसे सम्पन्न है, जिसे देखकर मैं चकित हूँ। मुझे तो कोई अन्य ही रूप दिखाइये। परमेश्वरी! आप जिसकी आश्रय हैं, वह व्यक्ति निश्चय ही अशोच्य और धन्य है। मा! कृपापूर्वक मुझपर अनुग्रह करें, आपको बारम्बार नमस्कार है॥ ३१-३२॥
श्रीमहादेव उवाच
इत्युक्ता सा तदा पित्रा शैलराजेन पार्वती।
तद्रूपमपि संहृत्य दिव्यं रूपं समादधे ॥ ३३ ॥