गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* गणेशगीता * | ४३
तथा नाशवाले हैं। तत्त्ववित् उनमें आसक्त नहीं होते ॥ २२ ॥
कारणे सति कामस्य क्रोधस्य सहते च यः।
तौ जेतुं वर्ष्मविरहात्स सुखं चिरमश्नुते ॥ २३ ॥
काम, क्रोध आदिका कारण उपस्थित रहनेपर भी जो उनके आवेगको रोक लेता है तथा शरीरके प्रति अनासक्त होकर उन्हें जीतनेका प्रयत्न करता है, वह बहुत कालतक सुख भोगता है ॥ २३ ॥
अन्तर्निष्ठोऽन्तःप्रकाशोऽन्तःसुखोऽन्तार्तिर्लभैत् ।
असन्दिग्धोऽक्षयं ब्रह्म सर्वभूतहितार्थकृत् ॥ २४ ॥
जिनके हृदयमें निष्ठा है, ज्ञानका प्रकाश है, सुख है तथा वैराग्य है, जो सब प्राणियोंका हित करता है, वह निश्चय ही अक्षय ब्रह्मको प्राप्त करता है ॥ २४ ॥
जेतारः षड्रिपूणां ये शमिनो दमिनस्तथा।
तेषां समन्ततो ब्रह्म स्वात्मज्ञानां विभात्यहो ॥ २५ ॥
जो काम-क्रोधादि छहों शत्रुओंको जीत चुके हैं, जो शम और दमका पालन करते हैं, उन आत्मज्ञानियोंको सर्वत्र ब्रह्म ही दीखता है ॥ २५ ॥
आसनेषु समासीनस्त्यक्त्वेमान् विषयान् बहिः।
संस्तभ्य भ्रुकुटीमास्ते प्राणायामपरायणः ॥ २६ ॥
सब बाह्य विषयोंका त्यागकर एकान्तमें आसनमें स्थित हो, दृष्टिको भ्रूमध्यमें स्थिरकर प्राणायाम करे ॥ २६ ॥
प्राणायामं तु संरोधं प्राणापानसमुद्भवम्।
वदन्ति मुनयस्तं च त्रिधाभूतं विपश्चितः ॥ २७ ॥
प्राण और अपान वायुके रोकनेको प्राणायाम कहते हैं, बुद्धिमान् ऋषियोंने उसके तीन भेद कहे हैं ॥ २७ ॥