गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- भगवतीगीता * ४४९
रहती है-को धारण करके लाचार-सा बना हुआ इस संसारमें व्यवहार करता है ॥ २५ ॥
विशुद्धः स्फटिको यद्वद्रक्तपुष्पसमीपतः ।
तत्तद्वर्णयुतो भाति वस्तुतो नास्ति रञ्जनम् ॥ २६ ॥
बुद्धीन्द्रियादिसामीप्यादात्मनोऽपि तथा गतिः ।
मनो बुद्धिरहंकारो जीवस्य सहकारिणः ॥ २७ ॥
स्वकर्मवशतात्तात फलभोक्तार एव ते।
सर्वं वैषयिकं तात सुखं वा दुःखमेव वा ॥ २८ ॥
त एव भुञ्जते नात्मा निर्लेपः प्रभुरव्ययः ।
रक्तवर्णके पुष्पके समीप स्थित शुद्ध स्फटिक उसके सांनिध्यके कारण उसीके रंगसे युक्त लाल प्रतीत होता है; जबकि वास्तवमें उसमें रंग विद्यमान नहीं रहता है। बुद्धि, इन्द्रिय आदिके सांनिध्यके कारण आत्माकी भी वही गति होती है। मन, बुद्धि तथा अहंकार जीवके सहयोगी हैं। तात ! अपने-अपने कर्मोंके अधीन होकर वे ही कर्म-फलका भोग करते हैं। वे सभी समस्त विषयात्मक सुखों तथा दुःखोंका भोग करते हैं; आत्मा भोग नहीं करता; क्योंकि यह आत्मा प्रभुतासम्पन्न, विकाररहित तथा निर्लिप्त है ॥ २६-२८ १/२ ॥
सृष्टिकाले पुनः पूर्ववासनावासितैः सह ॥ २९ ॥
जायते जीव एवं हि वसत्याभूतसम्प्लवम् ।
ततो ज्ञानविचारेण त्यक्त्वा मोहं विचक्षणः ॥ ३० ॥
सुखी भवेन्महाराज इष्टानिष्टोपपत्तिषु ।
सृष्टिके समय यह जीव पूर्वजन्मकी वासनाओंसे युक्त अन्तःकरणके साथ उत्पन्न होता है और इस प्रकार यह जीव प्रलयपर्यन्त सृष्टिमें निवास करता है। इसलिये महाराज ! विद्वान् पुरुषको चाहिये कि ज्ञान-