भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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  • गणेशगीता * ४५

पूरकं कुम्भकं चैव रेचकं च ततोऽभ्यसेत्।
अतीतानागतज्ञानी ततः स्याज्जगतीतले ॥ ३३ ॥

* पूरक-कुम्भक और रेचकका अभ्यास करके यह प्राणी इस जगत्में भूत, भविष्य तथा वर्तमान तीनों कालका ज्ञाता हो जाता है॥ ३३॥

प्राणायामैर्द्वादशभिरुत्तमैर्धारणा मता।
योगस्तु धारणे द्वे स्याद्योगीशस्ते सदाभ्यसेत् ॥ ३४ ॥

बारह उत्तम प्राणायामसे उत्तम धारणा होती है, दो धारणासे योग सिद्ध होता है, योगी निरन्तर धारणाका अभ्यास करे॥ ३४॥

एवं यः कुरुते राजंस्त्रिकालज्ञः स जायते।
अनायासेन तस्य स्याद्वश्यं लोकत्रयं नृप॥ ३५ ॥

हे राजन्! जो इस प्रकार साधना करते हैं, उन्हें त्रिकालका ज्ञान हो जाता है और अनायास त्रिलोकी उनके वशमें हो जाती है॥ ३५॥

ब्रह्मरूपं जगत्सर्वं पश्यति स्वान्तरात्मनि।
एवं योगश्च संन्यासः समानफलदायिनौ ॥ ३६ ॥

वह अपने अन्तरात्मामें सब जगत्को ब्रह्मरूप देखता है। इस प्रकारसे कर्मसंन्यास और कर्मयोग दोनों समान फलके देनेवाले हैं॥ ३६॥

जन्तूनां हितकर्तारं कर्मणां फलदायिनम्।
मां ज्ञात्वा मुक्तिमाप्नोति त्रैलोक्यस्येश्वरं विभुम् ॥ ३७ ॥

सब प्राणियोंके हितकारी और कर्मका फल देनेवाले एवं त्रिलोकीके व्यापक मुझ ईश्वरको जानकर मनुष्य मुक्त हो जाते हैं॥ ३७॥

॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां वैधसंन्यासयोगो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥


* पूरक—वायुको ऊपर खींचना, कुम्भक—वायुका रोध करना, रेचक—वायुका त्याग करना—ये तीन प्राणायामके अंग हैं।