भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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  • भगवतीगीता * | ४६३

शिवा ही परम शक्ति हैं। महाराज! तत्त्वदर्शी योगिजन मुझे ही शिव-शक्तिसे युक्त ब्रह्म एवं परात्पर तत्त्व कहते हैं॥ १३-१४ १/२ ॥

सृजामि ब्रह्मरूपेण जगदेतच्चराचरम् ॥ १५ ॥
संहरामि महारुद्ररूपेणान्ते निजेच्छया ।
दुर्वृत्तशमनाथाय विष्णुः परमपूरुषः ॥ १६ ॥
भूत्वा जगदिदं कृत्स्नं पालयामि महामते ।
अवतीर्य क्षितौ भूयो भूयो रामादिरूपतः ॥ १७ ॥
निहत्य दानवान्पृथ्वीं पालयामि पुनः पुनः ।
रूपं शक्त्यात्मकं तात प्रधानं यच्च मे स्मृतम् ॥ १८ ॥
यतस्तया विना पुंसः कार्यं नेहात्मना स्थितम् ।

मैं ब्रह्मरूपसे इस चराचर जगत्की सृष्टि करती हूँ, परम पुरुष विष्णु होकर इस सम्पूर्ण विश्वका पालन करती हूँ और अन्तमें अपनी इच्छासे दुराचारियोंके शमनके उद्देश्यसे महारुद्ररूपसे संहार करती हूँ। इसी तरह महामते! मैं राम आदि रूपोंसे पृथ्वीपर बार-बार अवतार लेकर दानवोंका वध करके पुनः-पुनः जगत्का पालन करती हूँ। तात! मेरा शक्त्यात्मक रूप ही प्रधान है; क्योंकि अपने स्वरूपमें स्थित रहता हुआ पुरुष उसके बिना कुछ भी करनेमें समर्थ नहीं है॥ १५-१८ १/२ ॥

रूपाण्येतानि राजेन्द्र तथा काल्यादिकानि च ॥ १९ ॥
स्थूलानि विद्धि सूक्ष्मं च पूर्वमुक्तं तवानघ ।
अनभिज्ञाय रूपं तु स्थूलं पर्वतपुङ्गव ॥ २० ॥
अगम्यं सूक्ष्मरूपं मे यद्दृष्ट्वा मोक्षभाग्भवेत् ।
तस्मात्स्थूले हि मे रूपं मुमुक्षुः पूर्वमाश्रयेत् ॥ २१ ॥
क्रियायोगेन तान्येव सम्भ्यर्च्य विधानतः ।
शनैरालोचयेत्सूक्ष्मं रूपं मे परमव्ययम् ॥ २२ ॥

राजेन्द्र! मेरे इन काली आदि रूपोंको स्थूलरूप जानो। निष्पाप!

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