गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७४ * गीता-संग्रह *
अहं कर्तेत्यहंमानमहाकृष्णााहिदंशितः। नाहं कर्तेति विश्वासामृतं पीत्वा सुखी भव ॥ ८ ॥ मैं कर्ता हूँ—इस मिथ्याभिमानरूप महान् अजगरने तुमको डँस लिया है। मैं कर्ता नहीं हूँ—इस विश्वासरूपी अमृतका पान करके तुम सुखी हो जाओ॥ ८॥
एको विशुद्धबोधोऽहमिति निश्चयवह्निना। प्रज्वाल्याज्ञानगहनं वीतशोकः सुखी भव ॥ ९ ॥ मैं अद्वितीय एवं विशुद्ध बोधस्वरूप हूँ—इस श्रेष्ठ निश्चयकी आगसे अज्ञानका घोर जंगल जलाकर तुम शोकरहित एवं सुखी हो जाओ॥ ९॥
यत्र विश्वमिदं भाति कल्पितं रज्जुसर्पवत्। आनन्दपरमानन्दः स बोधस्त्वं सुखं चर ॥ १० ॥ जिस अधिष्ठान आत्मामें यह सम्पूर्ण विश्व रज्जुमें सर्पके समान कल्पित होकर दीख रहा है, वह आनन्द-परमानन्द बोधस्वरूप तुम्हीं हो। अतः सुखी हो जाओ॥ १०॥
मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि। किंवदन्तीह सत्येयं या मतिः सा गतिर्भवेत् ॥ ११ ॥ जिसे ‘मैं मुक्त हूँ’—ऐसा अभिमान है, वह मुक्त है और जिसमें ‘मैं बद्ध हूँ’—ऐसा अभिमान है, वह बद्ध है। यह लोकोक्ति सत्य है कि जैसी मति वैसी गति॥ ११॥
आत्मा साक्षी विभुः पूर्ण एको मुक्तश्चिदक्रियः। असङ्गो निःस्पृहः शान्तो भ्रमात्संसारवानिव ॥ १२ ॥ आत्मा तो साक्षी, विभु, पूर्ण, अद्वितीय, मुक्त, चेतन, निष्क्रिय, असंग, निस्पृह एवं शान्त है। वह भ्रमसे ही संसारी मालूम पड़ता है॥ १२॥