गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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बोधमात्रोऽहमज्ञानादुपाधिः कल्पितो मया।
एवं विमृश्यतो नित्यं निर्विकल्पे स्थितिर्मम ॥ १७॥
मैं वस्तुतः बोधस्वरूप हूँ। अपने स्वरूपके अज्ञानसे मैंने उपाधिकी कल्पना कर ली है, नित्य ऐसा विचार करते रहनेपर यह सिद्ध हो जाता है कि मेरी स्थिति निर्विकल्पमें ही है॥ १७॥
अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम्।
न मे बन्धोऽस्ति मोक्षो वा भ्रान्तिः शान्ता निराश्रया ॥ १८॥
कितने आश्चर्य की बात है कि मुझमें सम्पूर्ण विश्वकी प्रतीति होते रहनेपर भी वह वस्तुतः मुझमें नहीं है। न तो कभी मुझे बन्धन हुआ और न तो मोक्ष। आश्रयहीन होनेके कारण भ्रान्ति स्वयं शान्त हो गयी॥ १८॥
सशरीरमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चितम्।
शुद्धचिन्मात्र आत्मा च तत्कस्मिन्कल्पनाधुना ॥ १९॥
यह निश्चय है कि इस शरीरके साथ यह सम्पूर्ण विश्व कुछ भी नहीं है और आत्मा शुद्ध चिन्मात्र है। फिर अब यह कल्पना किसमें सम्भव है ? अर्थात् किसीमें नहीं ॥ १९॥
शरीरं स्वर्गनरकौ बन्धमोक्षौ भयं तथा।
कल्पनामात्रमेवैतत्किं मे कार्यं चिदात्मनः ॥ २०॥
यह शरीर, स्वर्ग-नरक, बन्ध-मोक्ष और भय—यह सब केवल कल्पनामात्र है। फिर मुझ चिदात्माके लिये क्या कुछ कर्तव्य शेष है ? अर्थात् कुछ भी नहीं ॥ २०॥
अहो जनसमूहेऽपि न द्वैतं पश्यतो मम।
अरण्यमिव संवृत्तं क्व रतिं करवाण्यहम् ॥ २१॥
आश्चर्य तो यह है कि भीड़-भाड़में भी मुझे द्वैत नहीं दीखता,