भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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* अष्टावक्रगीता * ४८७


प्रत्यक्षमप्यवस्तुत्वाद्विश्वं नास्त्यमले त्वयि।
रज्जुसर्प इव व्यक्तमेवमेव लयं व्रज ॥ ३ ॥
यद्यपि जगत् प्रत्यक्ष दीख रहा है तथापि तुम्हारे शुद्ध स्वरूपमें इसका अस्तित्व नहीं है। यह तो (भ्रमवश) रज्जुमें सर्पके समान दीखने लगा है—ऐसा निश्चय करके तुम मुक्त हो जाओ ॥ ३ ॥

समदुःखसुखः पूर्ण आशानैराश्ययोः समः।
समजीवितमृत्युः सन्नेवमेव लयं व्रज ॥ ४ ॥
तुम पूर्ण हो, तुम यह जानकर कि सुख-दुःख, आशा-निराशा और जीवन-मृत्यु समान ही हैं, मुक्त हो जाओ ॥ ४ ॥

॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायामाचार्योक्तं लयचतुष्टयं नाम पञ्चमं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ५ ॥


छठा प्रकरण

आत्मा और प्राकृतिक जगत्की समानताका अनुभव

आकाशवदनन्तोऽहं घटवत्प्राकृतं जगत्।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ १ ॥
मैं आकाशके समान अनन्त हूँ और प्राकृतिक जगत् घटके समान है। यही ज्ञान है, ऐसी अवस्थामें न तो इस जगत्का त्याग है, न ग्रहण है और न तो लय ही है। (अनन्त देशकी दृष्टिसे अल्प देश नहीं होता) ॥ १ ॥

महोदधिरिवाहं स प्रपञ्चो वीचिसन्निभः।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ २ ॥
मैं महासमुद्रके समान हूँ और यह प्रपंच तरंगके समान। यही ज्ञान है। ऐसी अवस्थामें न तो इस प्रपंचका त्याग है, न ग्रहण है और न तो लय ही है। (कारणकी दृष्टिसे कार्य पृथक् नहीं होता) ॥ २ ॥

अहं स शुक्तिसङ्काशो रूप्यवद्विश्वकल्पना।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ ३ ॥
मैं सीपके समान हूँ और मुझमें रजतके समान विश्वकी कल्पना

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