गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* अष्टावक्रगीता * ४८९
नात्मा भावेषु नो भावस्तत्रानन्ते निरञ्जने।
इत्यसक्तोऽस्पृहः शान्त एतदेवाहमास्थितः ॥ ४॥
शरीरादिमें मैं आत्मा नहीं हूँ और न तो मुझ अनन्त शुद्धात्मामें शरीरादि ही हैं, अतः मुझमें न तो आसक्ति है, न स्पृहा। मैं परम शान्त हूँ—यही मेरी निष्ठा है॥ ४॥
अहो चिन्मात्रमेवाहमिन्द्रजालोपमं जगत्।
अतो मम कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना ॥ ५॥
कैसा आश्चर्य है कि मैं केवल चित्स्वरूप हूँ और यह जगत् इन्द्रजालके समान है। अब मुझे क्यों और किसमें त्याज्य और ग्रहणकी कल्पना हो?॥ ५॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायामनुभवपञ्चकविवरणं नाम सप्तमं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ७॥
आठवाँ प्रकरण
चित्तकी आसक्ति-अनासक्ति ही बन्धन-मोक्षका कारण
तदा बन्धो यदा चित्तं किञ्चिद्वाञ्छति शोचति।
किञ्चिन्मुञ्चति गृह्णाति किञ्चिद्धृष्यति कुप्यति ॥ १॥
जब चित्त कुछ चाहता है, किसीके लिये शोक करता है, किसी वस्तुको छोड़ता-पकड़ता है और किसी वस्तुसे रुष्ट एवं तुष्ट होता है, तभी बन्धन है॥ १॥
तदा मुक्तिर्यदा चित्तं न वाञ्छति न शोचति।
न मुञ्चति न गृह्णाति न हृष्यति न कुप्यति ॥ २॥
जब चित्त चाह, शोक, त्याग, ग्रहण, हर्ष और रोषसे रहित होता है, तभी मुक्ति है॥ २॥
तदा बन्धो यदा चित्तं सक्तं कास्वपि दृष्टिषु।
तदा मोक्षो यदा चित्तमसक्तं सर्वदृष्टिषु ॥ ३॥
जब चित्त किन्हीं दृष्टियोंमें आसक्त है, तब बन्धन है। जब