गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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होनेसे मैं विक्षेपके निमित्त उपस्थित होनेपर भी एकाग्र रहकर यों ही स्थित हूँ॥ २॥ समाध्यासादिविक्षिप्तौ व्यवहारः समाधये। एवं विलोक्य नियममेवमेवाहमास्थितः॥ ३॥ सम्यक् अध्यास आदिके कारण विक्षेप होनेपर समाधिके लिये साधन करना होता है। ऐसा नियम देखकर मैं यों ही स्थित हूँ॥ ३॥ हेयोपादेयविरहादेवं हर्षविषादयोः। अभावादद्य हे ब्रह्मन्नेवमेवाहमास्थितः॥ ४॥ त्याज्य-ग्राह्य, हर्ष और विषाद न होनेके कारण हे ब्रह्मस्वरूप ! मैं तो यों ही ज्यों-का-त्यों स्थित हूँ॥ ४॥ आश्रमाना श्रमं ध्यानं चित्तस्वीकृतवर्जनम्। विकल्पं मम वीक्ष्यैतैरेवमेवाहमास्थितः॥ ५॥ यह आश्रम है और यह आश्रमका त्याग, यह ध्यान है और यह विक्षेप, यह चित्तके द्वारा स्वीकार करनेयोग्य है और यह नहीं— इन बातोंसे विकल्प ही होता है। ऐसा देखकर मैं तो यों ही स्थित हूँ॥ ५॥ कर्मानुष्ठानमज्ञानाद्यथैवोपरमस्तथा । बुद्ध्वा सम्यगिदं तत्त्वमेवमेवाहमास्थितः॥ ६॥ जिस प्रकार कर्मानुष्ठान (कर्म करना) अज्ञानसे होता है, इसी प्रकार कर्मका त्याग भी अज्ञानसे ही होता है, इस तत्त्वको यथार्थ रीतिसे जानकर मैं इसी प्रकार (आत्मस्वरूपमें ही) स्थित हूँ॥ ६॥ अचिन्त्यं चिन्त्यमानोऽपि चिन्तारूपं भजत्यसौ। त्यक्त्वा तद्भावनं तस्मादेवमेवाहमास्थितः॥ ७॥ अचिन्त्य आत्मतत्त्वका चिन्तन करनेसे भी वह चिन्तनरूप हो जाता है। इसलिये उसका चिन्तन (भावना) छोड़कर मैं तो यों ही