गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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जिसका विद्वानोंमें बड़ा आदर रहा है। उत्तरगीतापर तो श्रीआद्यशंकराचार्यके गुरु श्रीगौड़पादाचार्यका भाष्य भी सौभाग्यसे उपलब्ध है।
शास्त्र तो अनन्त है; रुचियाँ, आवश्यकताएँ, मनःस्थितियाँ, परिस्थितियाँ इत्यादि भी भिन्न-भिन्न होती हैं। इसीलिये नाना इतिहास-पुराणादि ग्रन्थोंमें विभिन्न श्रेष्ठ जनोंद्वारा समय-समयपर दिये गये उपदेशोंके साररूपमें अन्यान्य गीताएँ प्राप्त होती हैं। कुछ प्राचीन गीताएँ स्वतन्त्र ग्रन्थके रूपमें भी उपलब्ध हैं। कुल मिलाकर इनकी संख्या शताधिक है। इनमें कई गीताएँ अत्यन्त प्रसिद्ध तथा बड़े महत्त्वकी हैं।
वस्तुतः वेदोंके तीन भाग हैं—कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड एवं ज्ञानकाण्ड। इसमें ज्ञानकाण्ड अन्तिम है इसलिये इसे 'वेदान्त' भी कहते हैं। उपनिषदोंका मुख्य विषय प्रायः यही है। उपनिषदोंमें गूढ़ भाषाशैलीमें वर्णित इसी ज्ञानतत्त्वको प्रायः विभिन्न गीताओंमें सरल, सुबोध भाषाशैलीमें अभिव्यक्त किया गया है। कहीं-कहीं उसे समझानेके लिये मनोरंजक दृष्टान्तों अथवा सहायक अनुकूल पृष्ठभूमिका भी सम्यक् उपयोग किया गया है।
'गीता' के मूलमें संस्कृतका 'गीतम्' शब्द है, परंतु 'उपनिषद्' शब्द स्त्रीलिंग होने तथा उसके अनुकरणके कारण 'गीता' शब्द बना माना जाता है। इसीलिये विभिन्न गीताओंकी पुष्पिकाओंमें भगवद्गीतोपनिषद्, भगवतीगीतोपनिषद्, शिवगीतोपनिषद् इत्यादि पाया जाता है। विभिन्न गीताओंमें भगवान्के भिन्न-भिन्न स्वरूपोंकी विभूतियोंका भी विशद् विवरण तथा श्रोताद्वारा विस्मित होकर की गयी उनकी स्तुतियाँ भी मिलती हैं अतएव 'गीयते स्तूयते यः स गीता'—ऐसा भी कह सकते हैं।
गीताप्रेसद्वारा सर्वमान्य श्रीमद्भगवद्गीता तो विभिन्न भाष्यों, टीकाओंके साथ विभिन्न रूपोंमें प्रारम्भसे ही सतत प्रकाशित हो रही है, परंतु अन्यान्य महत्त्वपूर्ण गीताएँ आज भी जनसामान्यके लिये दुर्लभ हैं। अधिकाधिक गीता-ग्रन्थ प्रमाणिक पाठ तथा सुबोध