गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अष्टावक्रगीता * ५०१
तुम विकल्प एवं विकारसे रहित बोधस्वरूप हो। सुखसे विचरो॥५॥
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
विज्ञाय निरहङ्कारो निर्ममत्वं सुखी भव॥६॥
समस्त पदार्थोंमें अपने-आपको और समस्त पदार्थोंको अपने-आपमें जानकर अहंकार और ममतासे रहित एवं सुखी हो जाओ॥६॥
विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरङ्गा इव सागरे।
तत्त्वमेव न सन्देहश्चिन्मूर्ते विज्वरो भव॥७॥
हे चित्स्वरूप! जिस अधिष्ठान चैतन्यमें यह विश्व समुद्रमें तरंगके समान चमक रहा है, वह तुम ही हो; इसमें सन्देह नहीं। तुम निश्चिन्त हो जाओ॥७॥
श्रद्धस्व तात श्रद्धस्व नात्र मोहं कुरुष्व भोः।
ज्ञानस्वरूपो भगवानात्मा त्वं प्रकृतेः परः॥८॥
वत्स! श्रद्धा करो, श्रद्धा करो, इस सम्बन्धमें भूल मत करो। तुम प्रकृति से परे ज्ञानस्वरूप और परमात्मा ही हो॥८॥
गुणैः संवेष्टितो देहस्तिष्ठत्यायाति याति च।
आत्मा न गन्ता नागन्ता किमेनमनुशोचसि॥९॥
गुणोंसे लपेटा हुआ यह शरीर ही रहता है, यही आता-जाता है। आत्मा न कहीं आता है, न जाता है; फिर तुम इसके लिये क्यों शोक करते हो?॥९॥
देहस्तिष्ठतु कल्पान्तं गच्छत्वद्यैव वा पुनः।
क्व वृद्धिः क्व च वा हानिस्तव चिन्मात्ररूपिणः॥१०॥
चाहे यह शरीर कल्पपर्यंत रहे और चाहे आज ही मर-मिट जाय, इससे तुम्हारी हानि अथवा लाभ ही क्या है? तुम केवल चित्-स्वरूप हो॥१०॥